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रविवार, 4 अक्टूबर 2020

👉 आसक्ति

प्रभु को यदि पाना है तो सब आसक्तियों को छोड़कर निर्वैर हो जाओ।

    भक्ति रसामृत सिंधु में आता है कि कामना ही राक्षसी है, ये जानता हुआ भक्त भगवान् या  भगवान् की भक्ति के अलावा और कोई भी कामना नहीं करता।  प्रभु को यदि पाना है तो सब आसक्तियों व कामनाओं को छोड़कर निर्वैर हो जाओ, प्रभु शीघ्र मिल जायेंगे। 

    जिसे एक गिलास पानी की भी आवश्यकता न हो, और न ही किसी से बात करने या बोलने की अपेक्षा हो, वो भक्त शान्त और निर्भय हो जाता है।  जैसे वर्षा पड़ने पर घास स्वतः उत्पन्न हो जाती है, उसी तरह आसक्तियों व कामनाओं को छोड़ने पर चारों ओर फिर प्रभु ही दिखाई देंगे। बिना आसक्ति छोड़े भगवद् भजन नहीं होता। 

    आसक्ति की रस्सी दिखाई नहीं देती है, परन्तु वह इतनी लम्बी होती है कि उसकी कोई सीमा नहीं है। आप अमेरिका में बैठे हैं, और आसक्ति की रस्सी वहीं से बाँधकर आपको ले आयेगी।  साधक को अपनी वृत्तियों को बचाकर रखना चाहिए।  यदि वृत्तियाँ  बँट गयीं तो साधक लुट जायेगा।  वृत्तियों के बँटने के बाद कुछ भी जप, तप व पाठ आदि करते रहो, कुछ नहीं मिलने वाला।  अपनी वृत्तियों को सब जगह से हटाकर एक श्री कृष्ण में लगा दो। जब तक कहीं भी आसक्ति है, चाहे थोड़ी ही क्यों न हो, तब तक वहाँ श्री कृष्ण प्रेम नहीं होता है।  

    प्रेम की उत्पत्ति तब ही होती है, जब जीव सब आसक्तियों को छोड़ देता है। इसलिए गोपियों ने श्री कृष्ण से कहा था कि हम सब कुछ छोड़कर तुम्हारे पास आयीं हैं। अपनी सब आसक्तियों को छोड़कर आयीं हैं। क्यों छोड़कर आयीं हैं ? तुम्हारी उपासना की आशा से। 


मैवं विभो अहर्ति.....   भजते मुमुक्षून्||  श्रीमद्भागवत 10-29-31

देवहूति जी ने कहा-

संगो  य:  संसृते..... .... कल्पते||   श्रीमद्भागवत 03-23-55

    आसक्ति बहुत ख़राब है, परन्तु आसक्ति से अच्छी वस्तु भी कोई नहीं। यदि आसक्ति महापुरुषों में हो जाय तो निश्चित कल्याण हो जाता है। यदि ये आसक्ति संसार से नहीं छूटती है तो इसको महापुरुषों से बाँध दो। तुम्हारा अवश्य कल्याण हो जायेगा। 

सोमवार, 21 सितंबर 2020

👉 प्रभु की कृपा

अन्धा आँख प्राप्ति को प्रभु की कृपा समझता है, गरीब धन प्राप्ति को प्रभु की कृपा समझता है, रोगी निरोग होने को प्रभु की कृपा समझता है; किन्तु ये सब धोखा है, ये सब प्रभु की कृपा नहीं है। प्रभु जिस पर कृपा करते हैं, उसे अपनी शरण में ले लेते हैं और उस जीव की सब आसक्तियों को लूट लेते हैं, तब जीव एक मात्र प्रभु का आश्रय लेता है। यही प्रभु की सच्ची कृपा है।

भगवान् की कृपा और माया की कृपा, जीव पर ये दो कृपा होती रहती हैं। इन दोनों कृपाओं में बहुत अंतर है।  माया जब खुश होकर कृपा करती है तो धन, दौलत, यश, सम्मान दे देती है। माया की कृपा से मैं और मेरा के भाव जागृत हो जाते हैं। भगवान् ने ध्रुव जी से कहा- 

सत्याआशिषो हि  ...  वत्सकमनुग्रहकातरोअस्मान।| श्रीमद्भागवत 04-09-17 

जब प्रभु कृपा करते हैं तो धन आदि देने से पहले, मैं व मेरा की वृत्ति हटा देते हैं। जैसे प्रभु ने सुदामा जी को धन तो दिया परन्तु देने से पहले उनमें मेरा-तेरा की भावना बिल्कुल खत्म कर दी। भगवान् अपने भक्त का सदा भला चाहते हैं। जैसे - नारद जी ने भगवान् को नारी-विरह का श्राप दिया, परन्तु भगवान् ने नारद जी का कल्याण ही किया, उन पर रुष्ट नहीं हुए।

भगवान् तीन तरह से कृपा करते हैं। एक कृपा साक्षात् दर्शन देकर करते हैं, दूसरी कृपा मन से मंगल चाहकर करते हैं, जैसे कि अनेक निमित्त बना देना, बिना किसी प्रयत्न के कार्य बना देना  और तीसरी कृपा संस्पर्श से करते हैं। जैसे मछली अण्डे को दूर से देखती है और उसका पालन करती है। कछुआ दूर से ही अपने अण्डे का चिंतन करता है, इसी से अण्डे का पालन होता है, और वह बढ़ता है। 

सूर्य कभी नहीं पूछता कि अन्धकार कितना पुराना है? अन्धकार आज का है या वर्षों पुराना है। सूर्य की किरणें तो अन्धकार के पास पहुँचते ही उसे मिटा देती हैं। ऐसे ही प्रभु की कृपा कभी यह नहीं पूछती कि सामने वाला कितना बड़ा पापी है? प्रभु की कृपा होते ही जीव के समस्त पाप व कष्ट मिट जाते हैं। अगर प्रभु की करुणा पाना चाहते हो तो अपनी अहंता को निकाल दो।


मंगलवार, 15 सितंबर 2020

👉 अपने इष्ट के चरणों से अनुराग करो।

भगवान् के चरणों की शरण में गये बिना किसी भी साधन से माया को नहीं जीता जा सकता, क्योंकि एक तो ये माया दुस्तर है, दूसरा हमारा साधन भी सीमित है। किन्तु यदि भगवान् की कृपा दृष्टि पड़ जाये तो निश्चित वहाँ से माया भाग जायेगी। भगवान् का स्वभाव है, कि वो अपने आश्रित के दोष नहीं देखते और यदि उसमें थोड़ा सा भी गुण होता है तो प्रभु उसीसे रीझ जाते हैं।  

तुम पापी हो, भले हो, पुण्यात्मा हो, बुरे हो, ये सब मत सोचो। ऐसा सोचना तुम्हें दुर्बल बना देगा। केवल प्रभु के चरणों का ध्यान करो। उनके चरणों के आश्रय से अनन्त पाप नष्ट हो जाते हैं। हमें सिर्फ इतना सोचना है कि हम उनके चरणों में कैसे जाँये ? महत्व भले या बुरे का नहीं है अपितु इस बात का है कि हम जैसे भी हैं प्रभु के हैं। इसी बात को सूरदास जी ने अपने पद में कहा कि – 

प्रभु हम भले बुरे सो तेरे।
सब तजि तुम शरणागत आयो, दृढ़ करि चरण गहेरे।|
हम किसी और के नहीं हैं। हमको किसी और से लेना देना नहीं है। भगवान् का तो विरद है कि चाहे कोई सारे संसार का द्रोही है, सारे संसार का कत्ल करके आया है, तब भी उसे नहीं त्यागते। 

शरण गये प्रभु काहू न त्यागा, विश्व द्रोह कृत अघ जेही लागा।|
तुमने सुना होगा कि एक बार अमेरिका ने जापान में बम गिराया था। जो व्यक्ति हवाई जहाज से बम को गिराने के लिए गया था, जब उसने बम गिरा दिया तो वो दूर से दूरबीन में देखने लगा कि क्या हुआ ? वहाँ से उसने देखा कि लाखों लोग तड़फ रहे हैं। जहरीली गैस से लोगों का दम घुट रहा है, और वे तड़फ-तडफ कर मर रहे हैं तो यह देखकर वह व्यक्ति पागल हो गया क्योंकि उसने विश्व द्रोह किया था। 

यस्य नाहड़कृतो .....   हन्ति न निबध्यते।|  श्रीमद्भगवत्गीता 18/17
भगवान्  कहते हैं कि अगर तुम इतने बड़े पापी भी हो कि विश्व द्रोह करके आये हो, परन्तु यदि तुम मेरी शरण में आ जाओ तो तुरंत उसी समय क्षमा कर दिये जाओगे। भगवान् इतने बड़े क्षमाशील हैं कि तुम जैसे भी हो यदि भगवान्  की शरण में आ गये तो जैसे लोहा पारस के स्पर्श से सोना बन जाता है, वैसे ही तुम भी उसी समय सोना बन जाओगे ! अर्थात् तुम्हारे सब पाप नष्ट हो जायेंगे। सूरदास जी कहते हैं -  
" बड़ी है कृष्ण नाम की ओट, 
शरण गये प्रभु नाहीं निकारे, करत कृपा की कोट
बैठत सबै सभा हरि जू की, कौन बड़ो को छोट 
सूरदास पारस के परसे, मिटे लोह की खोट ”

एक तो ये मार्ग है कि गुणों का अर्जन करते हुए भक्ति करो। परन्तु दूसरा मार्ग प्रह्लाद जी कहते हैं- कि “अपने इष्ट के चरणों की आराधना करो गुण तो तुम्हारे अंदर स्वतः ही आ जायेंगे।”  अतः गुणों का भी आश्रय मत करो। गुण अपने देवताओं सहित स्वतः चले आयेंगे, सिर्फ अपने इष्ट के चरणों में अनुराग करो। 

👉 एक बात मेरी समझ में कभी नहीं आई

🏳️ध्यान से पढ़ियेगा👇      〰️〰️〰️〰️〰️ एक बात मेरी समझ में कभी नहीं आई कि  ये फिल्म अभिनेता (या अभिनेत्री) ऐसा क्या करते हैं कि इनको एक फिल्म...