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शनिवार, 6 जुलाई 2019

👉 सबसे ऊँची प्रार्थना

चार शब्दों की उच्चतम प्रार्थना

एक जादूगर जो मृत्यु के करीब था, मृत्यु से पहले अपने बेटे को चाँदी के सिक्कों से भरा थैला देता है और बताता है की "जब भी इस थैले से चाँदी के सिक्के खत्म हो जाएँ तो मैं तुम्हें एक प्रार्थना बताता हूँ, उसे दोहराने से चाँदी के सिक्के फिर से भरने लग जाएँगे। उसने बेटे के कान में चार शब्दों की प्रार्थना कही और वह मर गया। अब बेटा चाँदी के सिक्कों से भरा थैला पाकर आनंदित हो उठा और उसे खर्च करने में लग गया। वह थैला इतना बड़ा था की उसे खर्च करने में कई साल बीत गए, इस बीच वह प्रार्थना भूल गया। जब थैला खत्म होने को आया तब उसे याद आया कि "अरे! वह चार शब्दों की प्रार्थना क्या थी।" उसने बहुत याद किया, उसे याद ही नहीं आया।

अब वह लोगों से पूँछने लगा। पहले पड़ोसी से पूछता है की "ऐसी कोई प्रार्थना तुम जानते हो क्या, जिसमें चार शब्द हैं। पड़ोसी ने कहा, "हाँ, एक चार शब्दों की प्रार्थना मुझे मालूम है, "ईश्वर मेरी मदद करो।" उसने सुना और उसे लगा की ये वे शब्द नहीं थे, कुछ अलग थे। कुछ सुना होता है तो हमें जाना-पहचाना सा लगता है। फिर भी उसने वह शब्द बहुत बार दोहराए, लेकिन चाँदी के सिक्के नहीं बढ़े तो वह बहुत दुःखी हुआ। फिर एक फादर से मिला, उन्होंने बताया की "ईश्वर तुम महान हो" ये चार शब्दों की प्रार्थना हो सकती है, मगर इसके दोहराने से भी थैला नहीं भरा। वह एक नेता से मिला, उसने कहा "ईश्वर को वोट दो" यह प्रार्थना भी कारगर साबित नहीं हुई। वह बहुत उदास हुआ।

उसने सभी से मिलकर देखा मगर उसे वह प्रार्थना नहीं मिली, जो पिताजी ने बताई थी। वह उदास होकर घर में बैठा हुआ था तब एक भिखारी उसके दरवाजे पर आया। उसने कहा, "सुबह से कुछ नहीं खाया, खाने के लिए कुछ हो तो दो।" उस लड़के ने बचा हुआ खाना भिखारी को दे दिया। उस भिखारी ने खाना खाकर बर्तन वापस लौटाया और ईश्वर से प्रार्थना की, "हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद।" अचानक वह चोंक पड़ा और चिल्लाया की "अरे! यही तो वह चार शब्द थे।" उसने वे शब्द दोहराने शुरू किए-"हे ईश्वर तुम्हारा धन्यवाद"........और उसके सिक्के बढ़ते गए... बढ़ते गए... इस तरह उसका पूरा थैला भर गया।

इससे समझें की जब उसने किसी की मदद की तब उसे वह मंत्र फिर से मिल गया। "हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद।" यही उच्च प्रार्थना है क्योंकि जिस चीज के प्रति हम धन्यवाद देते हैं, वह चीज बढ़ती है। अगर पैसे के लिए धन्यवाद देते हैं तो पैसा बढ़ता है, प्रेम के लिए धन्यवाद देते हैं तो प्रेम बढ़ता है। ईश्वर या गुरूजी के प्रति धन्यवाद के भाव निकलते हैं की ऐसा ज्ञान सुनने तथा पढ़ने का मौका हमें प्राप्त हुआ है। बिना किसी प्रयास से यह ज्ञान हमारे जीवन में उतर रहा है वर्ना ऐसे अनेक लोग हैं, जो झूठी मान्यताओं में जीते हैं और उन्हीं मान्यताओं में ही मरते हैं। मरते वक्त भी उन्हें सत्य का पता नहीं चलता। उसी अंधेरे में जीते हैं, मरते हैं।

ऊपर दी गई कहानी से समझें की "हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद" ये चार शब्द, शब्द नहीं प्रार्थना की शक्ति हैं। अगर यह चार शब्द दोहराना किसी के लिए कठिन है तो इसे तीन शब्दों में कह सकते हैं, "ईश्वर तुम्हार धन्यवाद।" ये तीन शब्द भी ज्यादा लग रहे हों तो दो शब्द कहें, "ईश्वर धन्यवाद !" और दो शब्द भी ज्यादा लग रहे हों तो सिर्फ एक ही शब्द कह सकते हैं, "धन्यवाद।" आइए, हम सब मिलकर एक साथ धन्यवाद दें उस ईश्वर को, जिसने हमें मनुष्य जन्म दिया और उसमें दी दो बातें - पहली "साँस का चलना" दूसरी "सत्य की प्यास।" यही प्यास हमें खोजी से भक्त बनाएगी। भक्ति और प्रार्थना से होगा आनंद, परम आनंद, तेज आनंद।

बुधवार, 19 जून 2019

👉 "नियम का महत्व"

एक संत थे। एक दिन वे एक किसान के घर गए। किसान ने उनकी बड़ी सेवा की। सन्त ने उसे कहा कि रोजाना नाम -जप करने का कुछ नियम ले लो। किसान ने कहा बाबा, हमारे को वक्त नहीं मिलता। सन्त ने कहा कि अच्छा, रोजाना ठाकुर जी की मूर्ति के दर्शन कर आया करो। किसान ने कहा मैं तो खेत में रहता हूँ और ठाकुर जी की मूर्ति गाँव के मंदिर में है, कैसे करूँ ? 

संत ने उसे कई साधन बताये, कि वह कुछ-न-कुछ नियम ले लें। पर वह यही कहता रहा कि मेरे से यह बनेगा नहीं, मैं खेत में काम करूँ या माला लेकर जप करूँ। इतना समय मेरे पास कहाँ है ? बाल-बच्चों का पालन पोषण करना है। आपके जैसे बाबा जी थोड़े ही हूँ। कि बैठकर भजन करूँ। संत ने कहा कि अच्छा तू क्या कर सकता है ? किसान बोला कि पड़ोस में एक कुम्हार रहता है। उसके साथ मेरी मित्रता है। उसके और मेरे खेत भी पास-पास हैं, और घर भी पास-पास है। रोजाना एक बार उसको देख लिया करूँगा। सन्त ने कहा कि ठीक है, उसको देखे बिना भोजन मत करना। किसान ने स्वीकार कर लिया। जब उसकी पत्नी कहती कि भोजन कर लो। तो वह चट बाड़ पर चढ़कर कुम्हार को देख लेता। और भोजन कर लेता। इस नियम में वह पक्का रहा। 
  
एक दिन किसान को खेत में जल्दी जाना था। इसलिए भोजन जल्दी तैयार कर लिया। उसने बाड़ पर चढ़कर देखा तो कुम्हार दीखा नहीं। पूछने पर पता लगा कि वह तो मिट्टी खोदने बाहर गया है। किसान बोला कि कहाँ मर गया, कम से कम देख तो लेता। अब किसान उसको देखने के लिए तेजी से भागा। उधर कुम्हार को मिट्टी खोदते-खोदते एक हाँडी मिल गई। जिसमें तरह-तरह के रत्न, अशर्फियाँ भरी हुई थीं। उसके मन में आया कि कोई देख लेगा तो मुश्किल हो जायेगी। अतः वह देखने के लिए ऊपर चढा तो सामने वह किसान आ गया।

कुम्हार को देखते ही किसान वापस भागा। तो कुम्हार ने समझा कि उसने वह हाँडी देख ली। और अब वह आफत पैदा करेगा। कुम्हार ने उसे रूकने के लिए आवाज लगाई। किसान बोला कि बस देख लिया, देख लिया। कुम्हार बोला कि अच्छा, देख लिया तो आधा तेरा आधा मेरा, पर किसी से कहना मत। 

किसान वापस आया तो उसको धन मिल गया। उसके मन में विचार आया कि संत से अपना मनचाहा नियम लेने में इतनी बात है। अगर सदा उनकी आज्ञा का पालन करूँ तो कितना लाभ है। ऐसा विचार करके वह किसान और उसका मित्र कुम्हार दोनों ही भगवान् के भक्त बन गए।

तात्पर्य यह है कि हम दृढता से अपना एक उद्देश्य बना ले, नियम ले लें तो वह भी हमारी डुबती किश्ती पार लगा सकता है। 

शनिवार, 15 जून 2019

👉 दुष्ट अपने कर्मों का फल अवश्य पाता है

एक बार एक चक्रवर्ती सम्राट आखेट हेतु वन गमन पर थे। दैववश वे अपने सहायको से अलग हो गए। विशाल वन के किसी अनजान छोर पर उन्हें मार्ग पर एक सांप दिखा जो "उल्टा "चल रहा था मतलब सर से पुंछ की तरफ। राजा को देख वह अत्यंत ही दारुन्य अवस्था में राजा से बोला "राजन मै एक दुर्धुष रोग से अत्यंत ही पीड़ित हूँ। मेरी सहायता करे। मै आपका शरणागत हूँ। 

राजा द्रवित हो गए जैसा की हिन्दू राजाओ के डीएनए में है। पूछा क्या उपचार है इसका। 
सर्प बोला, " राजन किसी स्वस्थ व्यक्ति के उदर मे यदि मुझे 4 महीने शरण मिले तो मै स्वस्थ हो सकता हु अन्यथा कोई और उपाय नहीं है जीवन का। 
राजा ने परोपकार के महत्व का स्मरण कर सर्प को अपने उदर में शरण दे दी। 

वन से निकलते ही राजा एक अनजान राज्य के अनजान नगर में आ पहुंचे। उदरस्थ सर्प के प्रभाव से राजा रुग्ण हो गए और शक्तिहीन होकर एक चोराहे पर गिर पड़े। 
दैवयोग से तभी एक दण्डित युवती को उसके पिता द्वारा उसी चोराहे पर लाया गया और सजा के रूप में उस रुग्ण भिखारी से दिख रहे राजा से उसका विवाह करवा दिया गया। 
युवती अपने पति राजा को लेकर एक खंडहर में रुकी और अपने पति को शारीरिक रूप से पुष्ट करने का प्रयास करने लगी। कुछ पारिश्रमिक भी वह लाती और खंडहर में छुपा देती। 

कई दिन हो गए युवती के प्रयास को लेकिन राजा की तबियत और बिगड़ती चली गई साथ ही रोज ही छुपाया हुआ परिश्रमिक भी चोरी हो जाता। युवती परेशां हो गई। 
रोज मंदिर जाने लगी।  एक दिन थोडा जल्दी ही अचानक अपने खंडहर आ गई।  दो लोगो की आवाज आती देख वह ओट से छुप कर देखने लगी की एक बिल से एक विशाल काला सर्प राजा के पास आकर एक सांप को बुरा भला कह रहा था। 

"अरे दुष्ट वाम मार्गी सर्प बाहर निकल क्यों इस तरुण सुदर्शन व्यक्ति का शरीर नष्ट कर रहा है इसके उदर में स्थित होकर। इसने तुझे आश्रय दिया और तू उसे ही निगल रहा है दुष्ट। "

ये सब सुनकर अचानक राजा के मुह से एक विशाल हरा सर्प बाहर आया पहले पूछ फिर सिर। बाहर आकर उल्टा चलता हुआ उस काले नाग पर प्रतिप्रहार करने लगा। 
'सरे महाधूर्त काले नाग तू तो और भी निकृष्ट है जो अथाह धन पर बैठ कर रोज इस पुरुष की स्त्री द्वारा अर्जित किये हुए धन को निगल जाता है। स्त्री का कमाया धन चुराता है पापी। 

दोनों एक दूसरे पर लगातार आरोप लगा रहे थे की अचानक कालनाग बोला, " क्या कोई नहीं जानता की छाछ को गर्म करके उसमे कटु निम्ब के नरम पत्ते डाल कर इस व्यक्ति को पिलाया जाए तो तू इसके शरीर से बाहर आकर मृत्यु को प्राप्त हो जाए। 

यह सुनकर वामी सर्प बोला की यह भी सभी जानते है सरसो के तेल को गर्म करके उसमे कर्पूर डाल कर तेरे बिल में डाल दिया जाए तो तू भी तत्काल अपने गिरोह के साथ मारा जायेगा और सारा धन उस व्यक्ति को सिद्ध हो जायेगा। 

युवती ने दोनों की बात सुन ली। वह अत्यंत हर्षित हुई। फटाफट बाजार से सभी सामान लाकर उसने राजा को छाछ पिला दी कुछ ही देर मे राजा को वमन के साथ वह वाम हरित सर्प बाहर आ गया और तड़पता हुआ मर गया। फिर युवती ने बिल में तेल डाल दिया वहा भी वह काल सर्प मारा गया और खजाना युवती ने प्राप्त कर लिया। 

कुछ ही दिनों में राजा स्वस्थ हो गए। स्त्री से पूछा। स्त्री ने सब कह सुनाया। राजा ने परिचय दिया की वे एक चक्रवर्ती सम्राट है। 

गुरुवार, 13 जून 2019

👉 ईश्वर पर विश्वास

जंगल में एक गर्भवती हिरनी बच्चे को जन्म देने को थी।

वो एकांत जगह की तलाश में घुम रही थी, कि उसे नदी किनारे ऊँची और घनी घास दिखी। उसे वो उपयुक्त स्थान लगा शिशु को जन्म देने के लिये।

वहां पहुँचते  ही उसे प्रसव पीडा शुरू हो गयी।

उसी समय आसमान में घनघोर बादल वर्षा को आतुर हो उठे और बिजली कडकने लगी।

उसने दाये देखा, तो एक शिकारी तीर का निशाना, उस की तरफ साध रहा था।

घबराकर वह दाहिने मुड़ी, तो वहां एक भूखा शेर, झपटने को तैयार बैठा था।

सामने सूखी घास आग पकड चुकी थी और पीछे मुड़ी, तो नदी में जल बहुत था।

मादा हिरनी क्या करती?
वह प्रसव पीडा से व्याकुल थी।
अब क्या होगा? 

क्या हिरनी जीवित बचेगी? क्या वो अपने शावक को जन्म दे पायेगी?
क्या शावक जीवित रहेगा? 

क्या जंगल की आग सब कुछ जला देगी?
क्या मादा हिरनी शिकारी के तीर से बच पायेगी?
क्या मादा हिरनी भूखे शेर का भोजन बनेगी?
वो एक तरफ आग से घिरी है और पीछे नदी है। क्या करेगी वो?

हिरनी अपने आप को शून्य में छोड़, अपने बच्चे को जन्म देने में लग गयी ।

कुदरत का कारिश्मा देखिये। बिजली चमकी और तीर छोडते हुए, शिकारी की आँखे चौंधिया गयी ।
उसका तीर हिरनी के पास से गुजरते, शेर की आँख में जा लगा, शेर दहाडता हुआ इधर उधर भागने लगा।

और शिकारी , शेर को घायल ज़ानकर भाग गया।
घनघोर बारिश शुरू हो गयी और जंगल की आग बुझ गयी।

हिरनी ने शावक को जन्म दिया।

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हमारे जीवन में भी कभी कभी कुछ क्षण ऐसे आते है, जब हम चारो तरफ से समस्याओं से घिरे होते हैं और कोई निर्णय नहीं ले पाते। तब सब कुछ नियति के हाथों सौंपकर अपने उत्तरदायित्व व प्राथमिकता पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। अन्तत: यश, अपयश, हार, जीत, जीवन, मृत्यु का अन्तिम निर्णय ईश्वर करता है। हमें उस पर विश्वास कर उसके निर्णय का सम्मान करना चाहिए।

कुछ लोग हमारी सराहना करेंगे,
कुछ लोग हमारी आलोचना करेंगे।

दोनों ही मामलों में हम फायदे में हैं,

एक हमें प्रेरित करेगा और
दूसरा हमारे भीतर सुधार लाएगा।।

अच्छा सोचें👌
सच्चा सोचें👍

गुरुवार, 30 मई 2019

👉 यह हमेशा ध्यान रखे

1) निम्बू-मिर्च खाने के लिये है.. कही टाँगने के लिए नहीं है।

2) बिल्लियाँ जंगली या पालतू जानवर है, बिल्ली के रास्ता काटने से कुछ गलत नहीं होता.. बल्कि चूहों से होनेवाले नुक्सान को बचाया जा सकता है।

3) छींकना एक नैसर्गिक क्रिया है, छींकने से कुछ अनहोनी नहीं होती ना हि किसी काम में बाधा आती है। छींकने से शरीर की सोई हुई मांसपेशियां सक्रिय  हो जाती है।

4) भूत पेड़ों पर नहीं रहते, पेड़ों पर पक्षी रहते है।

5) चमत्कार जैसी कोई चीज नहीं होती। हर घटना के पीछे वैज्ञानिक कारण होता है।

6) तांत्रिक, बाबा, कर्मकांडी जैसे लोग झुठे होते है, जिन्हें शारारिक मेहनत नहीं करनी ; ये वही लोग है। 

7) जादू टोना, या किसी ने कराया ऐसा कुछ नहीं होता, ये दुर्बल लोगों के मानसिक विकार है। 
जादू-टोना करके आपके ग्रहो की दिशा बदलने वाले बाबा, हवा और मेघों की दिशा बदलकर बारिश नहीं ला सकते क्या? सीमाओं पर हमारे जवानों को शहीद होने से बचा नहीं सकते है क्या ?

8 ) वास्तुशास्त्र भ्रामक है। सिर्फ दिशाओ का डर दिखाकर लूटने का तरीक़ा है।
वास्तविक तो पृथ्वी ही खुद हर क्षण अपनी दिशा बदलती है। अगर कुबेर जी उत्तर दिशा में है तो एक ही स्थान या दिशा में अमीर और गरीब दोनों क्यों पाये जाते है?

9) मन्नत के लिये बलि, टिप या चढ़ावे से भगवान प्रसन्न होकर फल देते है, तो क्या भगवान् रिश्वतखोर है?
आध्यात्म मोक्ष के लिए है, धन कमाने के लिए नहीं। 

नोट -- यह मेसैज 15 दूसरे ग्रूप्स में भेजने से कोई खुशखबरी नहीं मिलेगी और इसको डिलीट करने पर कोई अनहोनी भी नहीं होगी। 
परंतु इसे Farword करने से आपके कई मित्र मेहनत और कर्म का महत्त्व जरूर जान सकेंगे। 

कर्मयोगी बनो, मन का डर भगाओ।

रविवार, 27 मई 2018

"मोदी जी" आप को "शर्म" आनी चाहिए


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कि आपने "अपने परिवार" और अपने भाइयों को अपनी "कैबिनेट" में या "राजनीति" में लाने का ज़रा भी "प्रयास नहीं किया" आप को इस बात के लिए भी "शर्म" आनी चाहिए कि आप के "भाई" साधारण नागरिक का जीवन जी रहे हैं और आप की "भतीजी गरीबी" में "मर गई"  !!

"मोदी जी" आप को "शासन चलाने" की कला "मुलायम सिंह" से "सीखनी" चाहिए जहाँ "सैफई" के उनके परिवार के करीब "36 सदस्य" आज "उत्तर प्रदेश" में "ब्लाक प्रमुख" के पदों पर सुशोभित हैं वही "मुलायम सिंह" जिन्हें "दो वक़्त की रोटी" भी मुश्किल से नसीब होती थी आज "करोडपति" ही नहीं "अरबपति" हैं  !!


"30 वर्ष" पहले "बहन मायावती" का "पूरा परिवार" दिल्ली में "एक कमरे" में रहा करता था, आज "मायावती के भाई" का "बंगला" सुन्दरता में "ताज महल" को भी "मात" दे रहा है  !!

"देवगोडा" अपने "पोते" को "100 करोड़" की "बहु भाषाई फिल्म" में बतौर "सुपर हीरो" उतार रहे हैं, "कर्नाटक" के "हासन जिले" में "आधी से ज्यादा" खेती की ज़मीन "देवगोडा परिवार" की है  !!

"कर्नाटक" के मुख्यमंत्री "सिद्धारमैया" का "बेटा" जो  "सरकारी अस्पताल" में "मुख्य चिकित्सक" है और "छोटा पुत्र" जिसका अभी हाल में "निधन" हुआ है, उसका "ब्रुसेल्स" में बड़ा कारोबार है, और उसके बच्चे "जर्मनी" में "पढ़" रहे हैं

"सोनिया का दामाद" जो कि "मुरादाबाद" में "पुराने पीतल" के आइटम "बेचा" करता था, आज "पांच सितारा होटल" का "मालिक" है, उसका "शिमला" में एक "महल" है और "लक्ज़री कारों" का "मालिक" है  !!

जबकि "आप की माँ" आज भी "ऑटोरिक्शा" में चलती है और आप के "भाई ब्लू कालर जॉब" यानि मेंहनत "मजदूरी" कर रहे हैं और आप की एक "भतीजी" शिक्षामित्र है (आप उसे टीचर की नौकरी भी नहीं दिलवा पाए ) जो कि दूसरो के "कपडे सिलती" है तथा "ट्यूशन पढ़ा" कर अपनी "जीविका" चला रही है !!

"मोदी जी" देश बहुत "शर्मिंदा" है कि आप "प्रधानमंत्री" होते हुए भी अपने "भाइयों" को "MLA या MP" का "टिकट नहीं दिलवा पाए" आप "चाहते" तो अपनी "बहनों" को "राज्य सभा" में "MP" बनवा सकते थे और आप के "जीजा", "जिला स्तर" के "चुनाव लड़" कर "ब्लाक प्रमुख" तो बन ही सकते थे, आप "सीखने" में बहुत "सुस्त" हैं "15 वर्ष" तक "गुजरात" में और "प्रधानमंत्री" का "3/4 कार्यकाल", "दिल्ली" में बिताने के बाद भी आप "लालू, मुलायम, सोनिया गाँधी, बहन मायावती" से कुछ भी "नहीं सीखे" और अपनी "रसोई का खर्च" भी "खुद वहन" कर रहे हैं  !!
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उपरोक्त बातो से हमे "शर्मिंदा" तो होना पड़ा लेकिन उतना ही "गर्व" भी है 

कि हमने अपने जीवन का "वोट", "2014" में एक बहुत ही "ईमानदार और देशभक्त इंसान" को वोट दिया "हम सभी गर्व" करते है की हमे अपने जीवन में आप जैसे देशभक्त का मार्गदर्शन मिला सच में "ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठ" की "पराकाष्ठा" है 

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

👉 रावण को जलाने से कुछ नहीं होगा....

🔴 मगर सोचो जरा आज कितने रावण हैं जो राह चलती बच्ची, लड़की या फिर औरत को  कैसे ओर किस तरह नोचते हैं... मेरी तो ये सब सुनकर भी रूह कांप जाती है, ओर उन लोगों में से दस प्रतिशत  को  भी सजा  नहीं  मिल पाती!         

🔵 जैसा आज के लोग कर रहे हैं, रावण ने तो ऐसा वैसा कोई काम भी नही किया था और आप उसे हर साल जलाते हो, और सोचो जरा कितने लोग ऐसे हैं जो नन्ही सी बच्ची तक  को अपहरण किये बगैर बलात्कार करके मार डालते हैं क्या कभी ऐसे लोगों को  रावण की जगह बीच चौराहों पर जला पाओगे... नहीं ना... क्योंकि कानून आड़े आता है अरे रावण को सदियों से जला रहे हो... कोई कानून आड़े आया... आया क्या... जो आज के बलात्कारी करते हैं वैसा कोई घिनोना काम भी तो रावण ने नहीं किया था फिर भी देशभर के हर चौराहों पर उसे जलाने का नाटक करते हो...!

🔴 जलाना हैं तो उन पाखंडी साधु संतों को जलाओ जो धर्म के नाम पर बहु बेटियों का शारीरिक शोषण कर रहे हैं....

🔵 जलाना है तो सफेद खादी वस्त्र धारण किये उन पाखंडियों को जलाओ जो धर्म और जाति के नाम पर उंच नीच में समाज को बाँट रहे हैं....जिनके दस नहीं हजारो सर हैं। 

🔴 मैं सिर्फ इतना ही कहूँगा कि रावण जलाने से कुछ हासिल नहीं होगा, खुद के अन्दर के रावण को जलाओ अपने अन्दर छुपी बुराईयों को जलाओ दुनिया में से एक रावण कम हो जाएगा!

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शनिवार, 18 मार्च 2017

तरबूज की कहानी

मनोहर पार्रिकर द्वारा तरबूज की सच्ची कहानी

"मैं गोवा के पारा गाँव से हूँ इसलिए हमें पार्रिकर कहा जाता है।हमारा गाँव अपने तरबूजों के लिए प्रसिद्ध है। जब मैं छोटा था मेरे गाँव के किसान फसल के अंत में मई महीने में तरबूज खाने की प्रतियोगिता आयोजित करते थे।

गाँव और आस पास के सभी बच्चे तरबूज खाने के लिए बुलाए जाते थे और उन्हें अधिक से अधिक जितना तरबूज वे खा सकते थे खाना होता था।

वर्षों बाद मैं I.I.T.MUMBAI इंजीनियरिंग पढ़ने आ गया। मैं लगभग 6•5 वर्ष बाद अपने गाँव पहुँचा। मैंने तरबूजों के खेत और बाजार देखे।तरबूजे गायब थे। जो थोड़े बहुत थे वह भी काफी छोटे थे।

मैं उन किसानों को देखने पहुँचा जो तरबूज खाने की प्रतियोगिताएँ आयोजित करते थे। अब यह जिम्मेदारी उनके बेटे देख रहे थे। लेकिन मुझे पहले से कुछ अंतर दिखाई दिया।

पहले बुजुर्ग किसान हमें तरबूज खाने के बाद बीज थूकने के लिए कटोरी देते थे। एक शर्त यह भी होती थी कि तरबूज खाते समय कोई भी बीज कटना नहीं चाहिए।

वह हमें खाने के लिए अपने खेत के अच्छे से अच्छा, बड़े से बड़ा और मीठे से मीठा तरबूज देता थे। इस तरह से वह अपनी अगली फसल के लिए सर्वश्रेष्ठ सर्वोत्तम बीज चुन लेता थे। अगली फसल के तरबूज और भी अच्छे, बड़े और मीठे होते थे। हम वास्तव में बिना वेतन के सर्वश्रेष्ठ बीज चयन करने वाले कुशल बाल श्रमिक होते थे। यह मुझे बाद में पता चला।

उनके बेटों को लगा कि बड़े और मीठे तरबूज बाजार में बेचने पर अधिक धन मिलेगा। इसलिए उन्होंने बड़े, मीठे और अच्छे तरबूज बेचने शुरू कर दिए और प्रतियोगिता में छोटे और कम मीठे तरबूज रखने शुरू कर दिए।

इस प्रकार वर्ष प्रति वर्ष तरबूजे छोटे और छोटे होते गए। तरबूज की उत्पादकता एक वर्ष की होती है। इस प्रकार सात वर्ष में गोवा के पारा गाँव के सर्वश्रेष्ठ तरबूज विलुप्त हो गए।"

"मनुष्य में औसत उत्पादकता 25 वर्ष है। नस्ल परिवर्तन में लगभग 200 वर्ष लग जाते हैं। हम अपनी पीढ़ियों को शिक्षित करने में क्या गलती कर रहे हैं इसका असर 200 वर्ष बाद पता चलेगा। और निश्चित रूप से उसको सुधारने में भी ।"

"जब तक हम अपनी शिक्षा व्यवस्था में सर्वश्रेष्ठ प्रशिक्षित एवं सुयोग्य अध्यापकों को स्थान नहीं देंगे हम विश्व में सर्वश्रेष्ठ नहीं हो सकते। हमें शिक्षा व्यवस्था में सर्वश्रेष्ठ लोगों को बिना भेदभाव के स्थान देना चाहिए।"

अगली पीढ़ी तक अपनी संस्कृति एवं सभ्यता एवं ज्ञान की विविधता को पहुँचाने की जिम्मेदारी सबकी है भारत के प्रत्येक नागरिक की है।और सभी को यह जिम्मेदारी पूरी लगन और ईमानदारी से निभाना चाहिए।


गुरुवार, 5 नवंबर 2015

प्रभु की कृपा

अन्धा आँख प्राप्ति को प्रभु की कृपा समझता है, गरीब धन प्राप्ति को प्रभु की कृपा समझता है, रोगी निरोग होने को प्रभु की कृपा समझता है; किन्तु ये सब धोखा है, ये सब प्रभु की कृपा नहीं है। प्रभु जिस पर कृपा करते हैं, उसे अपनी शरण में ले लेते हैं और उस जीव की सब आसक्तियों को लूट लेते हैं, तब जीव एक मात्र प्रभु का आश्रय लेता है। यही प्रभु की सच्ची कृपा है।

भगवान् की कृपा और माया की कृपा, जीव पर ये दो कृपा होती रहती हैं। इन दोनों कृपाओं में बहुत अंतर है। माया जब खुश होकर कृपा करती है तो धन, दौलत, यश, सम्मान दे देती है। माया की कृपा से मैं और मेरा के भाव जागृत हो जाते हैं।

जब प्रभु कृपा करते हैं तो धन आदि देने से पहले, मैं व मेरा की वृत्ति हटा देते हैं। जैसे प्रभु ने सुदामा जी को धन तो दिया परन्तु देने से पहले उनमें मेरा- तेरा की भावना बिल्कुल खत्म कर दी। भगवान् अपने भक्त का सदा भला चाहते हैं। जैसे - नारद जी ने भगवान् को नारी- विरह का श्राप दिया, परन्तु भगवान् ने नारद जी का कल्याण ही किया, उन पर रुष्ट नहीं हुए।

भगवान् तीन तरह से कृपा करते हैं। एक कृपा साक्षात् दर्शन देकर करते हैं, दूसरी कृपा मन से मंगल चाहकर करते हैं, जैसे कि अनेक निमित्त बना देना, बिना किसी प्रयत्न के कार्य बना देना और तीसरी कृपा संस्पर्श से करते हैं। जैसे मछली अण्डे को दूर से देखती है और उसका पालन करती है। कछुआ दूर से ही अपने अण्डे का चिंतन करता है, इसी से अण्डे का पालन होता है, और वह बढ़ता है।

सूर्य कभी नहीं पूछता कि अन्धकार कितना पुराना है? अन्धकार आज का है या वर्षों पुराना है। सूर्य की किरणें तो अन्धकार के पास पहुँचते ही उसे मिटा देती हैं। ऐसे ही प्रभु की कृपा कभी यह नहीं पूछती कि सामने वाला कितना बड़ा पापी है? प्रभु की कृपा होते ही जीव के समस्त पाप व कष्ट मिट जाते हैं। अगर प्रभु की करुणा पाना चाहते हो तो अपनी अहंता को निकाल दो।

👉 एक बात मेरी समझ में कभी नहीं आई

🏳️ध्यान से पढ़ियेगा👇      〰️〰️〰️〰️〰️ एक बात मेरी समझ में कभी नहीं आई कि  ये फिल्म अभिनेता (या अभिनेत्री) ऐसा क्या करते हैं कि इनको एक फिल्म...