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गुरुवार, 17 सितंबर 2020

👉 प्रोत्साहित करें.. हतोत्साहित नही....

पिता बेटे को डॉक्टर बनाना चाहता था। बेटा इतना मेधावी नहीं था कि PMT क्लियर कर लेता। इसलिए दलालों से MBBS की सीट खरीदने का जुगाड़ किया गया। जमीन, जायदाद जेवर गिरवी रख के 35 लाख रूपये दलालों को दिए, लेकिन वहाँ धोखा हो गया।

फिर किसी तरह विदेश में लड़के का एडमीशन कराया गया, वहाँ भी चल नहीं पाया। फेल होने लगा.. डिप्रेशन में रहने लगा। रक्षाबंधन पर घर आया और यहाँ फांसी लगा ली। 20 दिन बाद माँ बाप और बहन ने भी कीटनाशक खा के आत्म हत्या कर ली।

अपने बेटे को डॉक्टर बनाने की झूठी महत्वाकांक्षा ने पूरा परिवार लील लिया। माँ बाप अपने सपने, अपनी महत्वाकांक्षा अपने बच्चों से पूरी करना चाहते हैं ...

मैंने देखा कि कुछ माँ बाप अपने बच्चों को

Topper बनाने के लिए इतना ज़्यादा अनर्गल दबाव डालते हैं कि बच्चे का स्वाभाविक विकास ही रुक जाता है। 

आधुनिक स्कूली शिक्षा बच्चे की evaluation और grading ऐसे करती है जैसे सेब के बाग़ में सेब की खेती की जाती है। पूरे देश के करोड़ों बच्चों को एक ही syllabus पढ़ाया जा रहा है .......

For Example  -- जंगल में सभी पशुओं को एकत्र कर सबका इम्तहान लिया जा रहा है और पेड़ पर चढ़ने की क्षमता देख के Ranking निकाली जा रही है। यह शिक्षा व्यवस्था ये भूल जाती है कि इस प्रश्नपत्र में तो बेचारा हाथी का बच्चा फेल हो जाएगा और बन्दर First आ जाएगा।

अब पूरे जंगल में ये बात फ़ैल गयी कि कामयाब वो जो झट से कूद के पेड़ पर चढ़ जाए। बाकी सबका जीवन व्यर्थ है।

इसलिए उन सब जानवरों के,  जिनके बच्चे कूद के झटपट पेड़ पर न चढ़ पाए, उनके लिए कोचिंग Institute खुल गए, व्हाँ पर बच्चों को पेड़ पर चढ़ना सिखाया जाता है। चल पड़े हाथी, जिराफ, शेर और सांड़, भैंसे और समंदर की सब मछलियाँ चल पड़ीं अपने बच्चों के साथ, Coaching institute की ओर ........ हमारा बिटवा भी पेड़ पर चढ़ेगा और हमारा नाम रोशन करेगा।


हाथी के घर लड़का हुआ ....... 

तो उसने उसे गोद में ले के कहा- 'हमरी जिन्दगी का एक ही मक़सद है कि हमार बिटवा पेड़ पर चढ़ेगा।' और जब बिटवा पेड़ पर नहीं चढ़ पाया, तो हाथी ने सपरिवार ख़ुदकुशी कर ली।

अपने बच्चे को पहचानिए। वो क्या है, ये जानिये। हाथी है या शेर ,चीता, लकडबग्घा , जिराफ ऊँट है या मछली , या फिर हंस , मोर या कोयल ? क्या पता वो चींटी ही हो ?

और यदि चींटी है आपका बच्चा, तो हताश निराश न हों। चींटी धरती का सबसे परिश्रमी जीव है और अपने खुद के वज़न की तुलना में एक हज़ार गुना ज्यादा वजन उठा सकती है। 

इसलिए अपने बच्चों की क्षमता को परखें और जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें.. हतोत्साहित नही......

शनिवार, 28 मार्च 2020

👉 एक सूफी कहानी 🔥

एक फकीर जो एक वृक्ष के नीचे ध्यान कर रहा था,  रोज एक लकड़हारे को लकड़ी काटते ले जाते देखता था। एक दिन उससे कहा कि सुन भाई, दिन— भर लकड़ी काटता है, दो जून रोटी भी नहीं जुट पाती। तू जरा आगे क्यों नहीं जाता। वहां आगे चंदन का जंगल है। एक दिन काट लेगा, सात दिन के खाने के लिए काफी हो जाएगा।

गरीब लकड़हारे को भरोसा तो नहीं आया, क्योंकि वह तो सोचता था कि जंगल को जितना वह जानता है और कौन जानता है! जंगल में ही तो जिंदगी बीती। लकड़ियां काटते ही तो जिंदगी बीती। यह फकीर यहां बैठा रहता है वृक्ष के नीचे, इसको क्या खाक पता होगा? मानने का मन तो न हुआ, लेकिन फिर सोचा कि हर्ज क्या है, कौन जाने ठीक ही कहता हो! फिर झूठ कहेगा भी क्यों? शांत आदमी मालूम पड़ता है, मस्त आदमी मालूम पड़ता है। कभी बोला भी नहीं इसके पहले। एक बार प्रयोग करके देख लेना जरूरी है।

तो गया। लौटा फकीर के चरणों में सिर रखा और कहा कि मुझे क्षमा करना, मेरे मन में बड़ा संदेह आया था, क्योंकि मैं तो सोचता था कि मुझसे ज्यादा लकड़ियां कौन जानता है। मगर मुझे चंदन की पहचान ही न थी। मेरा बाप भी लकड़हारा था, उसका बाप भी लकड़हारा था। हम यही काटने की, जलाऊ—लकड़ियां काटते—काटते जिंदगी बिताते रहे, हमें चंदन का पता भी क्या, चंदन की पहचान क्या! हमें तो चंदन मिल भी जाता तो भी हम काटकर बेच आते उसे बाजार में ऐसे ही। तुमने पहचान बताई, तुमने गंध जतलाई, तुमने परख दी। जरूर जंगल है। मैं भी कैसा अभागा! काश, पहले पता चल जाता! फकीर ने कहा कोई फिक्र न करो, जब पता चला तभी जल्दी है। जब घर आ गए तभी सबेरा है। दिन बड़े मजे में कटने लगे। एक दिन काट लेता, सात— आठ दिन, दस दिन जंगल आने की जरूरत ही न रहती। 

एक दिन फकीर ने कहा; मेरे भाई, मैं सोचता था कि तुम्हें कुछ अक्ल आएगी। जिंदगी— भर तुम लकड़ियां काटते रहे, आगे न गए; तुम्हें कभी यह सवाल नहीं उठा कि इस चंदन के आगे भी कुछ हो सकता है? उसने कहा; यह तो मुझे सवाल ही न आया। क्या चंदन के आगे भी कुछ है? उस फकीर ने कहा : चंदन के जरा आगे जाओ तो वहां चांदी की खदान है। लकडिया—वकडिया काटना छोड़ो। एक दिन ले आओगे, दो—चार छ: महीने के लिए हो गया।

अब तो भरोसा आया था। भागा। संदेह भी न उठाया। चांदी पर हाथ लग गए, तो कहना ही क्या! चांदी ही चांदी थी! चार—छ: महीने नदारद हो जाता। एक दिन आ जाता, फिर नदारद हो जाता। लेकिन आदमी का मन ऐसा मूढ़ है कि फिर भी उसे खयाल न आया कि और आगे कुछ हो सकता है। फकीर ने एक दिन कहा कि तुम कभी जागोगे कि नहीं, कि मुझी को तुम्हें जगाना पड़ेगा। आगे सोने की खदान है मूर्ख! तुझे खुद अपनी तरफ से सवाल, जिज्ञासा, मुमुक्षा कुछ नहीं उठती कि जरा और आगे देख लूं? अब छह महीने मस्त पड़ा रहता है, घर में कुछ काम भी नहीं है, फुरसत है। जरा जंगल में आगे देखकर देखूं यह खयाल में नहीं आता?

उसने कहा कि मैं भी मंदभागी, मुझे यह खयाल ही न आया, मैं तो समझा चांदी, बस आखिरी बात हो गई, अब और क्या होगा? गरीब ने सोना तो कभी देखा न था, सुना था। फकीर ने कहा : थोड़ा और आगे सोने की खदान है। और ऐसे कहानी चलती है। फिर और आगे हीरों की खदान है। और ऐसे कहानी चलती है। और एक दिन फकीर ने कहा कि नासमझ, अब तू हीरों पर ही रुक गया? अब तो उस लकड़हारे को भी बडी अकड़ आ गई, बड़ा धनी भी हो गया था, महल खड़े कर लिए थे। उसने कहा अब छोड़ो, अब तुम मुझे परेशांन न करो। अब हीरों के आगे क्या हो सकता है?

उस फकीर ने कहा. हीरों के आगे मैं हूं। तुझे यह कभी खयाल नहीं आया कि यह आदमी मस्त यहां बैठा है, जिसे पता है हीरों की खदान का, वह हीरे नहीं भर रहा है, इसको जरूर कुछ और आगे मिल गया होगा! हीरों से भी आगे इसके पास कुछ होगा, तुझे कभी यह सवाल नहीं उठा?

रोने लगा वह आदमी। सिर पटक दिया चरणों पर। कहा कि मैं कैसा मूढ़ हूं मुझे यह सवाल ही नहीं आता। तुम जब बताते हो, तब मुझे याद आता है। यह तो मेरे जन्मों—जन्मों में नहीं आ सकता था खयाल कि तुम्हारे पास हीरों से भी बड़ा कोई धन है। 

फकीर ने कहा : उसी धन का नाम ध्यान है। 

अब खूब तेरे पास धन है, अब धन की कोई जरूरत नहीं। अब जरा अपने भीतर की खदान खोद, जो सबसे कीमती है।

बुधवार, 17 जुलाई 2019

👉 क्या-क्या प्राप्त करना शेष

अभी हमारे लिए क्या-क्या प्राप्त करना शेष रहा है, जानते हो? देखो:-

प्रेम- 
क्योंकि अभी तक हमने केवल द्वेष और आत्मसंतोष की ही साधना की है।

ज्ञान? 
क्योंकि अभी तक हम केवल स्खलन अवलोकन और विचारशक्ति को ही प्राप्त कर सके हैं।

आनन्द? 
क्योंकि अभी तक हम केवल दुःख सुख तथा उदासीनता को ही प्राप्त कर सके हैं।

शक्ति? 
क्योंकि अभी तक निर्बलता, प्रयत्न और विजय पराजय तक ही हम पहुँच सके हैं।

जीवन? 
अर्थात् प्राण। अभी तक मानव केवल जन्म, मृत्यु और वृद्धि ही देख सका है।

अद्वैत? 
क्योंकि अभी तक मानवजाति को युद्ध और स्वार्थ साधन करने की विद्या ही आती है।

एक शब्द में कहें तो अभी हमें भगवान को प्राप्त करना है। हमें अपने को उसके दिव्य स्वरूप को प्रतिमा बनाकर आत्मा का पुनर्निर्माण करना है।

सोमवार, 15 जुलाई 2019

👉 ना सम्मान का मोह... ना अपमान का भय..

एक फ़क़ीर था, उसके दोनों बाज़ू नहीं थे। उस बाग़ में मच्छर भी बहुत होते थे। मैंने कई बार देखा उस फ़क़ीर को। आवाज़ देकर, माथा झुकाकर वह पैसा माँगता था। एक बार मैंने उस फ़क़ीर से पूछा – ” पैसे तो माँग लेते हो, रोटी कैसे खाते हो? ”

उसने बताया – ”जब शाम उतर आती है तो उस नानबाई को पुकारता हूँ, ‘ओ जुम्मा ! आके पैसे ले जा, रोटियाँ दे जा। ‘ वह भीख के पैसे उठा ले जाता है, रोटियाँ दे जाता है।”

मैंने पूछा – ” खाते कैसे हो बिना हाथों के? ”
वह बोला – ” खुद तो खा नहीं सकता। आने-जानेवालों को आवाज़ देता हूँ ‘ ओ जानेवालों ! प्रभु तुम्हारे हाथ बनाए रखे, मेरे ऊपर दया करो! रोटी खिला दो मुझे, मेरे हाथ नहीं हैं। ‘हर कोई तो सुनता नहीं, लेकिन किसी-किसी को तरस आ जाता है। वह प्रभु का प्यारा मेरे पास आ बैठता है। ग्रास तोड़कर मेरे मुँह में डालता जाता है, मैं खा लेता हूँ।”

सुनकर मेरा दिल भर आया। मैंने पूछ लिया – ” पानी कैसे पीते हो?”
उसने बताया – ”इस घड़े को टांग के सहारे झुका देता हूँ तो प्याला भर जाता है। तब पशुओं की तरह झुककर पानी पी लेता हूँ।”
मैंने कहा – ”यहाँ मच्छर बहुत हैं। यदि मच्छर लड़ जाए तो क्या करते हो?”
वह बोला – ”तब शरीर को ज़मीन पर रगड़ता हूँ। पानी से निकली मछली की तरह लोटता और तड़पता हूँ।”

हाय! केवल दो हाथ न होने से कितनी दुर्गति होती है!
अरे, इस शरीर की निंदा मत करो! यह तो अनमोल रत्न है! शरीर का हर अंग इतना कीमती है कि संसार का कोई भी खज़ाना उसका मोल नहीं चुका सकता। परन्तु यह भी तो सोचो कि यह शरीर मिला किस लिए है? इसका हर अंग उपयोगी है। इनका उपयोग करो!

स्मरण रहे कि ये आँखे पापों को ढूँढने के लिए नहीं मिलीं।
कान निंदा सुनने के लिए नहीं मिले।
हाथ दूसरों का गला दबाने के लिए नहीं मिले।
यह मन भी अहंकार में डूबने या मोह-माया में फसने को नहीं मिला।
ये आँख सच्चे सतगुरु की खोज के लिये मिली है जो हमें परमात्मा के बताये मार्ग पर चलना सिखाये।
ये हाथ प्राणी मात्र की सेवा करने को मिले हैं।
ये पैर उस रास्ते पर चलने को मिले है जो परम पद तक जाता हो।
ये कान उस संदेश सुनने को मिले है जिसमे परम पद पाने का मार्ग बताया जाता हो।
ये जिह्वा प्रभु का गुण गान करने को मिली है।
ये मन उस प्रभु का लगातार शुक्र और सुमिरन करने को मिला है।
प्रभु तेरा शुक्र है, शुक्र है..लाख लाख शुक्र है।

हम बदलेंगे, युग बदलेगा

शनिवार, 6 जुलाई 2019

👉 आदमी और रिश्ते

 एक-एक भिंडी को प्यार से धोते पोंछते हुये वह काट रही थी। अचानक एक भिंडी के ऊपरी हिस्से में छेद दिख गया, सोचा भिंडी खराब हो गई, वह फेंक देगी लेकिन नहीं, उसने ऊपर से थोड़ा काटा, कटे हुये हिस्से को फेंक दिया। फिर ध्यान से बची भिंडी को देखा, शायद कुछ और हिस्सा खराब था, उसने थोड़ा और काटा और फेंक दिया फिर तसल्ली की, बाक़ी भिंडी ठीक है कि नहीं। तसल्ली होने पर काट के सब्ज़ी बनाने के लिये रखी भिंडी में मिला दिया।

वाह क्या बात है, पच्चीस पैसे की भिंडी को भी हम कितने ख्याल से, ध्यान से सुधारते हैं, प्यार से काटते हैं, जितना हिस्सा सड़ा है उतना ही काट के अलग करते हैं, बाक़ी अच्छे हिस्से को स्वीकार कर लेते हैं।

ये तो क़ाबिले तारीफ है, लेकिन अफसोस। इंसानों के लिये कठोर हो जाते हैं एक ग़लती दिखी नहीं कि उसके पूरे व्यक्तित्व को काट के फेंक देते हैं, उसके सालों के अच्छे कार्यों को दरकिनार कर देते हैं। महज अपने ईगो को संतुष्ट करने के लिए उससे हर नाता तोड़ देते हैं।

क्या पच्चीस पैसे की एक भिंडी से भी कमतर हो गया है आदमी और रिश्ते??? 🤔
विचार करें। 🙏

बुधवार, 19 जून 2019

👉 जाने क्यों -❓

🔵➖ खाने को सादा दाल रोटी होती थी, लेकिन फिर भी किसी को खून की कमी नहीं होती थी,--- ना (जाने क्यों ?)

🔵➖ स्कूल मे अध्यापक खूब कान खींचते थे, डंडों से पिटाई होती थी, लेकिन कोई बच्चा स्कूल में डिप्रेशन के कारण आत्महत्या नहीं करता था,---ना (जाने क्यों,,?)

🔵➖ बचपन मे महँगे खिलौने नहीं मिलते थे, लेकिन हर खेल बहुत आनंदित करता था,----ना (जाने क्यों),?

🔵➖ घर कच्चे होते थे, कमरे कम होते थे,---लेकिन (((माता -पिता कभी वृद्धाश्रम))) नहीं जाते थे,,------ना (जाने क्यों),?

🔵➖ घर मे गाय की, कुत्ते की,अतिथि की मेहमानों की रोटियां बनती थी, फिर भी घर का बजट संतुलित रहता था,--- आज सिर्फ़ अपने परिवार की रोटी महंगी हो गयीं है,----ना (जाने क्यों),? 

🔵➖ महिलाओं के लिए कोई जिम या कसरत के विशेष  साधन नहीं थे, फिर भी महिलाएं संपूर्ण रूप से स्वस्थ्य रहती थी,------ना (जाने क्यों),?

🔵➖ भाई -भाई मे, भाई-बहनों मे अनेक बार खूब झगड़ा होता था, आपस मे कुटाई तक होती थी,-परंतु आपस  मे मनमुटाव कभी नहीं होता था,,---ना( जाने क्यों),?

🔵➖ परिवार बहुत बडे होते थे, पडोसियों के बच्चे भी दिनभर खेलते थे, फिर भी ((घरों में ही शादियां)) होती थी,,-----ना (जाने क्यों),?

🔵➖ माता-पिता थोडी सी बात पर थप्पड़ मार देते थे, लेकिन उनका मान-सम्मान कभी कम नहीं होता था,----ना (जाने क्यों),?

शनिवार, 15 जून 2019

👉 विनम्रता गुण

विनम्रता आपके आंतरिक प्रेम की शक्ति से आती है। दूसरों को सहयोग व सहायता का भाव ही आपको विनम्र बनाता है। यह कहना गलत है कि यदि आप विनम्र बनेंगे तो दूसरे आपका अनुचित लाभ उठाएँगे। जबकि यथार्थ स्वरूप में विनम्रता आपमें गज़ब का धैर्य पैदा करती है। आपमे सोचने समझने की क्षमता का विकास करती है। विनम्र व्यक्तित्व का एक प्रचंड आभामण्डल होता है। धूर्तो के मनोबल उस आभा से निस्तेज हो स्वयं परास्त हो जाते है। उल्टे जो विमम्र नहीं होते वे आसानी से धूर्तों के प्रभाव में आ जाते है क्योंकि धूर्त को तो अहंकारी का मात्र चापलूसी से अहं सहलाना भर होता है। बस चापलूसी से अहंकार प्रभावित हो जाता है। किन्तु जहाँ विनम्रता होती है वहाँ तो व्यक्ति को सत्य की अथाह शक्ति प्राप्त होती है। सत्य की शक्ति, मनोबल प्रदान करती है।

विनम्रता के प्रति पूर्ण समर्पण युक्त आस्था जरूरी है। मात्र दिखावे की ओढी हुई विनम्रता, अक्सर असफ़ल ही होती है। सोचा जाता है-‘पहले  विन्रमता से निवेदन करूंगा यदि काम न हुआ तो भृकुटि टेढी करूंगा’ यह चतुरता विनम्रता के प्रति अनास्था है, छिपा हुआ अहं भी है। कार्य पूर्व ही अविश्वास व अहं का मिश्रण असफलता ही न्योतता है। सम्यक् विनम्र व्यक्ति, विनम्रता को झुकने के भावार्थ में नहीं लेता। सच्चाई उसका पथप्रदर्शन करती है। निश्छलता उसे दृढ व्यक्तित्व प्रदान करती है।

अहंकार सदैव आपसे दूसरों की आलोचना करवाता है। वह आपको आलोचना-प्रतिआलोचना के एक प्रतिशोध जाल में फंसाता है। अहंकार आपकी बुद्धि को कुंठित कर देता है। आपके जिम्मेदार व्यक्तित्व को संदेहयुक्त बना देता है। अहंकारी दूसरों की मुश्किलों के लिए उन्हें ही जिम्मेवार कहता है और उनकी गलतियों पर हंसता है। जबकि अपनी मुश्किलो के लिए सदैव दूसरों को जवाबदार ठहराता है। और लोगों से द्वेष रखता है।

विनम्रता हृदय को विशाल, स्वच्छ और ईमानदार बनाती है। यह आपको सहज सम्बंध स्थापित करने के योग्य बनाती है। विनम्रता न केवल दूसरों का दिल जीतने में कामयाब होती है अपितु आपको अपना ही दिल जीतने के योग्य बना देती है। जो आपके आत्म-गौरव और आत्म-बल में उर्ज़ा का अनवरत संचार करती है। आपकी भावनाओं के द्वन्द समाप्त हो जाते है। साथ ही व्याकुलता और कठिनाइयां स्वतः दूर होती चली जाती है। एक मात्र विनम्रता से ही सन्तुष्टि, प्रेम और सकारात्मकता आपके व्यक्तित्व के स्थायी गुण बन जाते है।

गुरुवार, 13 जून 2019

👉 "एहसास"

रामायण कथा का एक अंश
जिससे हमे सीख मिलती है "एहसास" की...😊
    

श्री राम, लक्ष्मण एवम् सीताa' मैया चित्रकूट पर्वत की ओर जा रहे थे,
राह बहुत पथरीली और कंटीली थी!
की यकायक श्री राम के चरणों मे कांटा चुभ गया!

श्रीराम रूष्ट या क्रोधित नहीं हुए, बल्कि हाथ जोड़कर धरती माता से अनुरोध करने लगे!
बोले- "माँ, मेरी एक विनम्र प्रार्थना है आपसे, क्या आप स्वीकार करेंगी?"

धरती बोली- "प्रभु प्रार्थना नहीं, आज्ञा दीजिए!"

प्रभु बोले, "माँ, मेरी बस यही विनती है कि जब भरत मेरी खोज मे इस पथ से गुज़रे, तो आप नरम हो जाना!
कुछ पल के लिए अपने आँचल के ये पत्थर और कांटे छुपा लेना!
मुझे कांटा चुभा सो चुभा, पर मेरे भरत के पाँव मे आघात मत करना"

श्री राम को यूँ व्यग्र देखकर धरा दंग रह गई!
पूछा- "भगवन, धृष्टता क्षमा हो! पर क्या भरत आपसे अधिक सुकुमार है?
जब आप इतनी सहजता से सब सहन कर गए, तो क्या कुमार भरत सहन नही कर पाँएगें?
फिर उनको लेकर आपके चित मे ऐसी व्याकुलता क्यों ?"

श्री राम बोले- "नही...नही माते, आप मेरे कहने का अभिप्राय नही समझीं! भरत को यदि कांटा चुभा, तो वह उसके पाँव को नही, उसके हृदय को विदीर्ण कर देगा!"

"हृदय विदीर्ण!! ऐसा क्यों प्रभु?",
धरती माँ जिज्ञासा भरे स्वर में बोलीं!

"अपनी पीड़ा से नहीं माँ, बल्कि यह सोचकर कि...इसी कंटीली राह से मेरे भैया राम गुज़रे होंगे और ये शूल उनके पगों मे भी चुभे होंगे!
मैया, मेरा भरत कल्पना मे भी मेरी पीड़ा सहन नहीं कर सकता, इसलिए उसकी उपस्थिति मे आप कमल पंखुड़ियों सी कोमल बन जाना..!!"

अर्थात 
रिश्ते अंदरूनी एहसास, आत्मीय अनुभूति के दम पर ही टिकते हैं।
जहाँ गहरी आत्मीयता नही, वो रिश्ता शायद नही परंतु दिखावा हो सकता है 

इसीलिए कहा गया है कि...
रिश्ते खून से नहीं, परिवार से नही,
मित्रता से नही, व्यवहार से नही,
बल्कि...
सिर्फ और सिर्फ आत्मीय "एहसास" से ही बनते और निर्वहन किए जाते हैं।
जहाँ एहसास ही नहीं, 
आत्मीयता ही नहीं ..
वहाँ अपनापन कहाँ से आएगाl

मंगलवार, 20 नवंबर 2018

फ़ासले ऐसे भी होंगे...

‘‘जुबिन, हमारे वहां शिफ़्ट होने का क्या हुआ?’ उसने व्यग्रता से पूछा था. ‘बात चल रही है यार, समय लगता है...तुम तब तक दिल्ली में ही कोई काम क्यों नहीं ढूंढ़ लेतीं? तुम्हारा समय कट जाएगा.’ ‘पर हमें वहां आना है जुबिन...बच्चे और मैं तुम्हारा साथ चाहते हैं.’ 

‘करता हूं जल्दी कुछ...ओके बाय बाय. मेरी कैब आ गई है, अब फ़ोन रखता हूं. अपना और बच्चों का ख़्याल रखना.’ इतना कहकर जल्दबाज़ी में फ़ोन काट दिया गया. वह हाथों में रिसीवर पकड़े ख़ाली आंखों से दीवार को ताकती खड़ी रह गई थी. आसमान में बादल उमड़-घुमड़ रहे थे और ऐसे ही बादल उसके मन में भी घुमड़ रहे थे. आठ साल...एक लंबा अरसा था कम से कम उसके लिए... बीच के एक-दो साल छोड़ दिए जाएं तो आठ साल हो चुके थे जुबिन को अमेरिका जाकर और इन आठ सालों में उसने हर दिन उसे याद किया होगा, मगर क्या जुबिन के लिए भी वह उतनी ही दिल अज़ीज़ थी? क्या उनके रिश्ते में सचमुच अभी भी उतना ही लगाव बाक़ी है, जितना शादी के पहले वे महसूस किया करते थे?

आज जुबिन से करीब डेढ़ हफ़्ते बाद बात हुई थी. वह भी तब, जब उसने वॉट्सऐप पर तीखा-सा संदेश भेजा था. उसकी इच्छा थी कुछ सुख-दुख की बातें करे, बताए उसे कि उसके जाने के बाद वह कितनी अकेली हो गई है. कितनी मुश्क़िल होती है उसे अकेले सब कुछ संभालने में, अब बच्चे भी बड़े होते जा रहे हैं. क्या इस साल वह उसे और बच्चों को अपने साथ ले जाने वाला है? पर सब कुछ मन में ही रह गया. दो मिनट से भी कम की बातचीत में उसने बस ऊपरी तौर पर हालचाल पूछे और ख़्याल रखने की हिदायत के साथ फ़ोन काट दिया. क्या पति-पत्नी के बीच की प्यारभरी बातचीत ऐसी ही होती है? क्या इतना भी नहीं पूछा जा सकता था कि मेरे बिना कैसे रहती हो तुम? क्या यह नहीं कहा जा सकता था कि तुम्हारी बहुत याद आती है...पर...

उसकी आंखें भर आई थीं. यह सब सुने तो उसे अरसा हो गया था. शादी के बाद बमुश्क़िल सालभर साथ रहे होंगे दोनों... उसके बाद तो बस चिर विरह ही आया था उसके हिस्से में. अक्सर सोचती थी कि जुबिन को अपना करियर, अपना काम, अपनी तऱक्क़ी इतनी प्यारी थी तो उसने शादी की ही क्यों उससे? वह तो अच्छी-ख़ासी पढ़-लिख रही थी...उसे याद आया शादी के कुछ दिन बाद उसने जुबिन से लाड़ जताते हुए पूछा था, आख़िर बताओ तो तुमने मुझसे शादी क्यों की? उम्मीद थी कि वह कोई रोमैंटिक-सी बात कहेगा, मगर उसने छूटते ही कहा,‘क्या करता यार, शादी न करता तो तुम जैसी कम्पेटिटर को रास्ते से कैसे हटाता? मुझे हराने की आदत है, हारने की नहीं मगर तुम थी कि कहीं जीतने ही नहीं दे रही थीं.’

‘वॉट नॉनसेंस...’ वह बौखलाई थी...जुबिन ठठाकर हंस पड़ा था,‘अरे, जस्ट किडिंग बाबा..आई लव यू सच्ची.’
मगर अब उसे लगता कि वह जस्ट किडिंग नहीं था. वह तो कड़वा सच था जो जुबिन के मुंह से अचानक बाहर आ गया था. वह सचमुच बहुत ही होशियार छात्रा थी...कम्प्यूटर साइंस में पोस्टग्रैजुएशन करने वाली गिनी-चुनी लड़कियों में से एक. पिताजी के तबादले के कारण जुबिन के शहर में और उसी के कॉलेज में आ धमकी थी. उसके आने से पहले जुबिन कॉलेज का टॉपर था, मगर उसने पहले सेमेस्टर में ही उसके रिकॉर्ड को तोड़ दिया था. 98 प्रतिशत हासिल करके वह सभी की नज़रों में चढ़ गई थी. उसे याद आया, जुबिन पहले साल उससे बहुत ही कटा-कटा रहता था. एमएससी के पहले साल कॉलेज में टॉप करने पर तो उसने उसे बधाई तक नहीं दी थी. उसे भी क्या फ़र्क़ पड़ता था? जुबिन जैसे कई उसके आगे-पीछे थे मगर उसका एक मात्र लक्ष्य था अमेरिका से पीएचडी करने के लिए कॉलेज की छात्रवृत्ति पाना और इसके लिए वह जी-तोड़ मेहनत कर रही थी. 

फिर अचानक कॉलेज के एक कार्यक्रम को दोनों को साथ मिलकर आयोजित करने का ज़िम्मा सौंपा गया. इस बार जुबिन का रंग-ढंग पूरी तरह से बदला हुआ था. वह न केवल उससे खुलकर बातचीत करने लगा था, वरन उसके निकट रहने का भी प्रयास करता मालूम होता था. उसने भी इस दोस्ती के हाथ को थाम बढ़ाया...जुबिन भी उसी छात्रवृत्ति के लिए तैयारी कर रहा था अत: कार्यक्रम के बाद भी अक्सर दोनों मिलने लगे. साथ-साथ पढ़ने लगे, नोट्स साझा करने लगे...और ऐसे ही एक दिन उसके नोट्स में जुबिन का पत्र आया. उसके जीवन का पहला प्रेम पत्र, जिसे पढ़कर वह सचमुच अपने आपे में नहीं रही थी. उस दिन उसे लगा कि वह भी जुबिन को पसंद करती थी. इतने दिन तो पढ़ाई की लगन के चलते उसने कितनों के मौखिक प्रणय निवेदन ठुकरा दिए थे मगर इस तरह के इज़हार का यह पहला मौक़ा था. पता नहीं कैसा सम्मोहन था उस पत्र में कि वह बावरी-सी हो गई. सारे लक्ष्य धुंधला गए और याद रहा बस जुबिन और उसका प्रेम-पत्र...उसके अंदर के यौवन ने मानो अंगड़ाई ली थी और उसने प्रणय का उत्तर प्रणय से देना स्वीकार किया था.

कुछ ही दिनों में उसकी दुनिया बदल गई थी. जुबिन के प्रणय निवेदन को स्वीकारने के बाद उसका बहुत सारा व़क्तजुबिन के साथ बीतने लगा था. वह अक्सर कहता,‘अरे क्या करना है तुम्हें आगे पढ़कर, अमेरिका जाकर...मैं हूं न. हम शादी करेंगे और मैं तुम्हारा पूरा ख़्याल रखूंगा. किसी भी बात की कमी न होने दूंगा.’ कभी कहता,‘यार तुम लड़कियों को इतनी बढ़िया मौक़ा मिलता है-शादी करो और ऐश की ज़िंदगी जियो...ज़्यादा ही लगे तो किसी कॉलेज में पढ़ाने लगो... और तुम हो लोग फालतू के पचड़ों में पड़ जाती हो.’ 

उसकी दादी अक्सर कहा करती थीं,‘जब दिमाग़ पर शनि महाराज चढ़ते हैं तो मति मारी जाती है. सही-ग़लत कुछ समझ में नहीं आता.’ क्या ऐसा ही हुआ था उसके साथ उन दिनों? जैसे ब्रेनवॉश हो गया हो...जैसे किसी ने दिमाग़ में बसे उसके सारे सपनों को मिटाकर नई इबारत लिख डाली हो...कैसे दिनोंदिन जुबिन का नशा सिर चढ़कर बोलने लगा था. अमेरिका जाने के, आगे पढ़ने के उसके सारे ख़्वाब धुंधलाने लगे थे और आंखों में एक ही चमकदार सपना हिलोरें मारने लगा था-जुबिन की जीवनसाथी बनने का.
परीक्षा से पहले जुबिन ने उसे अपने घरवालों से मिलवाया. सुंदर, सुशिक्षित, ख़ानदानी लड़की को अपनाने में उन्हें भला कैसी हिचक होती? इसी तरह जुबिन और उसका परिवार भी उसके मां-पापा को पसंद आ गए थे. जुबिन के परिवार की सुदृढ़ आर्थिक पृष्ठभूमि और जुबिन की क़ाबिलियत को देखते हुए जुबिन के नौकरी में न होने की चिंता करने का कारण न था. उनके लिए एक और राहत की बात यह थी बेटी के दिमाग़ से आगे पढ़ने का भूत उतर गया था. अब वे उसकी शादी करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर सकते थे.

स्नातकोत्तर की परीक्षा के बाद दोनों विवाह बंधन में बंध गए. परीक्षा के नतीजों में इस बार टॉप पर जुबिन था, मगर उसे इसकी क्या परवाह होती...? उसे तो उसके इच्छित साथी यानी जुबिन का साथ मिल गया था. प्यार में पगा एक साल पलक झपकते बीत गया. जुबिन और वह, वह और जुबिन...मानो इसके अलावा आसपास कुछ था ही नहीं. इसी बीच जुबिन को पीएचडी के लिए छात्रवृत्ति मिली और यहां उसे अपनी कोख में पलते अंश के अस्तित्व का अहसास हुआ. जुबिन तो मानो ख़ुशी से पागल ही हो गया था. आख़िर दो-दो ख़ुशख़बरियां एक साथ उसकी झोली में आई थीं. सभी उस नन्हे मेहमान के क़दमों की शुभता का बखान करते न थकते थे. 

वह ख़ुश थी, पर आशंकित भी थी. जुबिन को तीन महीने में जाना था और उसके बाद कम से कम छह महीने तो भारत आने की उम्मीद थी ही नहीं. कैसे कटेगा इतना लंबा अरसा? जुबिन के बिना तो एक दिन भी काटना मुश्क़िल था उसके लिए. उस पर नए मेहमान की ज़िम्मेदारी सब कुछ गड्डमड्ड हो गया था उसके जीवन में. कितनी बार सोचती काश जुबिन का मन बदल जाए और वह अमेरिका जाने का इरादा छोड़ दे, जैसे उसने जुबिन के लिए सब छोड़ दिया, भुला दिया... मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. जुबिन चला गया अपनी पढ़ाई पूरी करने और वह उसके अंश को कोख में लिए बिसूरती रही विरहा की रातों में. फिर मां का बुलावा आया कि जुबिन तो है नहीं, प्रसव तक मायके में ही रह लेगी और वह मायके आ गई.

उसके कमरे में सब कुछ वैसा ही था, जैसा वह छोड़ गई थी. अपनी पुस्तकों पर हाथ फेरते उसे बीते दिन बेतरह याद आने लगे...अपने कमरे में उसने दीवार पर मार्कर से लिख रखा था-आई कैन, आई विल.. शादी के समय सारे घर की पुताई हुई थी मगर जाने क्या सोचकर मां ने उसे लिखा रहने दिया था और उसके आसपास ऐसा टेक्सचर करवा दिया था कि वह सुन्दर दिखाई देने लगा था. उस इबारत पर हसरत से हाथ फेरते हुए एकबारगी उसके मन में आया था-क्या कुछ ग़लत हो गया है? दो बूंद आंसू पलकों की कोर पर आकर थम गए थे, पर तभी मां की बात याद आई,‘अब जो कुछ सोचना, अच्छा ही सोचना. मां की सोच बच्चे पर बड़ा असर डालती है.’ उसने मन से सारी शंका-कुशंकाओं को परे धकेल दिया था. सोच लिया था-निर्णय मेरा तो उसके परिणामों की ज़िम्मेदारी भी मेरी ही है.

नौ माह बीते और उसने एक स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया. बच्ची के जन्म के बाद उसके जीवन का सूनापन भरने लगा था. उसकी तीमारदारी में दिन कैसे गुज़र जाता, पता ही नहीं चलता. जुबिन की भी ख़ुशी का पारावार न था. अभी कुछ महीने वह बच्ची को देख न सकेगा और तब तक उसे बिटिया की फ़ोटो और वीडियो से ही संतोष करना होगा, इसका उसे मलाल था. बिटिया का नाम जूही रखा गया. जुबिन और माही की बेटी जूही. 

उसे याद आया, जूही के जन्म के छह माह बाद जुबिन दो सप्ताह के लिए भारत आया था. सारे दिन बस माही और जूही में व्यस्त रहता. शादी के बाद की शायद यही सुनहरी यादें थीं उसके खाते में जो उसे जुबिन से जोड़े रखे हुए थीं. इसके बाद लंबी दूरी क़ायम हो गई थी. पहले-पहले तो लगातार बातचीत होती थी, स्काइप भी कर लिया करता था जुबिन, पर धीरे-धीरे ‘रिसर्च का काम बढ़ गया है, अक्सर फ़ील्ड में रहता हूं.’ का जुमला लगातार दोहराया जाने लगा...कहीं पढ़ा था उसने कि दूरियों की भी आदत हो जाती है. क्या जुबिन को भी उससे दूर रहने की आदत हो गई थी?

ख़ैर, समय कहां ठहरता है सो यहां भी नहीं ठहरा. जुबिन वापस आया अपने सिर पर कामयाबी का ताज पहने...वहां की पढ़ाई कैसी है, कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं. कितना कुछ था उसके पास कहने के लिए, मगर वह लाड़-दुलार कहीं खो गया था, कुछ तो बदला-बदला सा था दोनों के बीच. माही को लगा शायद इतने दिनों की दूरी के चलते ऐसा महसूस हो रहा है. उसने भरसक कोशिश की उसके क़रीब रहने की, उसे भरपूर प्यार देने की.

रिसर्च के दौरान ही जुबिन को एक बड़ी कंपनी में नौकरी का प्रस्ताव मिला था और वह उसके बारे में गंभीर था, मगर वीज़ा में कुछ मुश्क़िलें थीं अत: जुबिन ने दिल्ली में ही काम करना शुरू कर दिया. माही और जूही भी उसके साथ दिल्ली आ बसे. ज़िंदगी पटरी पर आने लगी थी. 

जूही स्कूल जाने लगी थी. माही चाहती थी कि वह भी कुछ काम शुरू करे, मगर जुबिन पहले परिवार पूर्ण करना चाहता था. जूही का एक भाई भी हो, जुबिन की इस इच्छा को भी माही ने स्वीकार किया. सालभर में उनके घर में फिर किलकारी गूंजी...जतिन का जन्म हुआ. जुबिन की कुंडली में शायद बच्चों के क़दमों से ही भाग्योदय लिखा था. जतिन तीन माह का होते-होते उसके पुराने प्रस्ताव को हरी झंडी मिल गई. वीज़ा मिलने के रास्ते खुल गए और जुबिन फिर सात समुंदर दूर उड़ने की तैयारी करने लगा. माही का दिल इस बार बुरी तरह से आशंकित था. दिल्ली जैसा शहर, वह अकेली दो बच्चों के साथ कैसे मैनेज करेगी? 

‘अरे यार चिंता किस बात की है? ढेर से रुपए भेजता रहूंगा मैं...जेब में रुपया हो तो सारी दिक़्क़तें भाग जाती हैं और यूं भी घर में सर्वेंट्स है, ड्राइवर है...डोंट वरी.’ 
‘पर तुम तो नहीं हो जुबिन. तुमसे दूर रह-रहकर थक गई हूं मैं,’ उसकी आवाज़ रुआंसी हो गई थी.

‘अरे यार, बस कुछ माह या हद से हद एक साल. फिर तो मुझे परिवार को साथ रखने की अनुमति मिल जाएगी. बस चली आना उड़कर मेरे पास..’ जुबिन ने उसे अपने आगोश में समेटते हुए कहा था. उसने जुबिन के सीने में मुंह छिपा लिया था.

मगर कुछ माह या एक साल ख़त्म ही नहीं हुआ. माही के पास सुविधाएं थीं, रुपए थे मगर जिस प्यार की ख़ातिर उसने अपना सब कुछ छोड़ दिया था, वही उसके जीवन से दूर होता जा रहा था. 

आज जुबिन के व्यवहार से उसे बड़ा धक्का लगा था. अब कहता है, दिल्ली में नौकरी ढूंढ़ लूं. जब नौकरी करना चाहती थी तब इसे एक और बच्चा चाहिए था...इडियट. यह प्यार नहीं था, उसका इस्तेमाल किया जा रहा था और वह...पढ़ी-लिखी लड़की होने का दंभ भरती मूर्खों की तरह इस्तेमाल होती जा रही थी. जुबिन उसे अपनी इच्छा के मुताबिक़ नचाता जा रहा था और वह कठपुतली बनी नाचती जा रही थी. वह अपने जीवन में सुखी था और यहां वह बेकार ही परेशान हो रही थी उसकी याद में.
कभी-कभी उसके मन में ख़्याल आता,‘कहीं जुबिन के जीवन में उसके अलावा कोई और तो नहीं आ गया है? नहीं तो उसमें ऐसा परिवर्तन आने का कारण क्या है?’ जुबिन द्वारा सोशल मीडिया पर साझा किए जा रहे फ़ोटो, घटनाएं आदि भी उसे विचलित करती थीं मगर दूसरे ही क्षण वह उस ख़्याल को मन से झटक देती. यह सब सोचना भी उसके लिए असहनीय था. कभी-कभी वह अपने बारे में सोचती तो हैरत में पड़ जाती...? इतनी कमज़ोर तो वह कभी भी नहीं थी, क्या प्यार आदमी को इतना कमज़ोर बना देता है? ऐसा क्या हुआ है जो उसकी दुनया केवल जुबिन के इर्दगिर्द ही आकर सिमट गई है? जितना सोचती, उतना ही इस भंवर में उलझती जाती और निकलने कोई रास्ता नहीं दिखाई देता. 

इसी उहापोह में एक और साल बीत गया. जुबिन प्रमोशन की कतार में था. व्यस्त से व्यस्ततम होता जा रहा था. ह़फ्ते में बमुश्क़िल दो बार बात होती. माही ने जतिन को स्कूल में दाख़िला दिला दिया था. अब उसके पास काफ़ी समय था...कुछ काम शुरू किया जा सकता है, इस पर सोच-विचार कर ही रही थी कि अवसर घर चला आया. सुहैल जो उसका कॉलेज मेट था, कम्प्यूटर ऐप्लिकेशन का एक स्टार्टअप शुरू करना चाहता था और उसके लिए माही की मदद चाहता था. माही पहले तो हिचकिचाई. उसे पढ़ाई छोड़े आठ साल हो चुके थे...क्या उससे हो पाएगा? मगर सुहैल को पूरा विश्वास था कि माही थोड़ी-सी तैयारी के बाद इस काम को सफलता से कर पाएगी.

ईश्वर का नाम लेकर माही ने वापस पढ़ना-लिखना शुरू किया. उनका लक्ष्य स्मार्ट टच तकनीक पर आधारित ऐसे उत्पाद विकसित करने का था, जिसका उपयोग लोग अपने घरों में सुरक्षा की दृष्टि से कर सकें. माही और सुहैल ने कुछ विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में तकनीक का अध्ययन करना शुरू किया. जैसे-जैसे दृष्टि स्पष्ट होती गई, माही का आत्मविश्वास वापस आने लगा. उसे लग रहा था मानो उसके जीवन में लंबी अंधेरी रात के बाद अब सूर्योदय हुआ है. कुछ ही समय में उसने जुबिन के पीछे पागल होती, भावुक माही को परदे के पीछे ठेल दिया था और अब सामने थी कॉलेज की पुरानी माही, कुछ करने के उत्साह से भरी, जिजीविषा से भरपूर...

उत्साह से भरकर उसने जुबिन को अपने नए काम के बारे में बताया. उसने छूटते ही कहा, ठीक है, करती रहो छोटे-मोटे काम, तुम्हारा मन लगा रहेगा और मैं भी यहां शांति से काम कर सकूंगा...बच्चों का ध्यान रखना मगर. माही को बुरा लगा उसके इतने ठंडे जवाब पर, मगर उसने अब सब भूलकर आगे बढ़ने की ठान ली थी. अब माही का अधिकाधिक समय काम में ही बीतता था अत: उसने मां-पापा को अपने पास बुला लिया. उनके आने से उसके लिए निश्चिंत होकर अपने काम में ध्यान देना आसान हो गया.
उनकी मेहनत रंग लाई और उन्होंने अपना पहला सुरक्षा उत्पाद बनाया. एक बड़े समारोह में इसका प्रदर्शन रखा गया. इस उत्पाद को लोगों का अच्छा प्रतिसाद मिला. माही और सुहैल आगे कुछ सोचते, उससे पहले ही एक बड़ी कंपनी ने उनकी कंपनी में बड़ा निवेश करने का प्रस्ताव दिया. यह प्रस्ताव इतना बड़ा था कि जल्दी ही समाचारों की सुर्ख़ियों में छा गया और यहां-वहां से बधाई के दौर शुरू हो गए. माही और सुहैल की ख़ुशी की सीमा न थी.

उसी रात जुबिन का फ़ोन घनघनाया. माही को यह अपेक्षित था, मगर उसमें आज न तो वैसी व्यग्रता थी न ही वैसा उल्लास. उसे अंदाज़ा था जुबिन की प्रतिक्रिया का. उसने शांत आवाज़ में कहा,‘‘बोलो जुबिन. कैसे याद किया?’’

‘‘याद किया मतलब? अपनी पत्नी को याद नहीं करूंगा क्या? और हां, आज ख़बर मिली सुहैल की कंपनी की...बढ़िया है.’’

‘‘सुहैल की नहीं, मेरी और सुहैल की कंपनी की जुबिन...’’ उसने सुधार किया.

‘‘अरे, तुम इसमें मत उलझो अब, यूं भी मेरा प्रमोशन हो गया है और एक दो महीने में तुम लोगों के वीज़ा की प्रक्रिया चालू कर दूंगा मैं...’’ 

‘‘माना कि तुम्हें हारने की आदत नहीं है, मगर इसके लिए मैं हारने की आदत डाल लूं, ये नहीं होगा. हर बार तुम नहीं जीतोगे जुबिन, इसबार मेरी बारी है,’’ माही का स्वर तीखा हो चला था.
‘‘क्या मतलब?’’ जुबिन अचकचाया था.

‘‘मतलब यह कि जब मुझे तुम्हारी बहुत ज़रूरत थी, तब तुम मेरे साथ नहीं थे जुबिन. मैं वहां आना चाहती थी, तुम्हारे साथ रहना चाहती थी... मगर अब मेरा मन बदल गया है.’’ माही ने स्पष्ट शब्दों में कहा.
‘‘क्या? होश में तो हो तुम?’’ जुबिन के स्वर में उग्रता थी.

‘‘हां जुबिन, होश आ गया है. अब इस शहर में मेरी अपनी पहचान है, अपना काम है, अपना अस्तित्व है...अब मैं अमेरिका नहीं आना चाहती. बार-बार अपनी पहचान खोना मेरे लिए मुमक़िन नहीं है.’’
‘‘और मेरे बारे में सोचा? मैं कैसे रहूंगा तुम्हारे और बच्चों के बिना?’’

‘‘वैसे ही, जैसे अब तक रहते आए हो और वैसे ही जैसे हम लोग इतने साल रहें...और फिर मन न लगे तो वापसी के रास्ते तो खुले ही हैं न जुबिन,’’ माही ने सर्द आवाज़ में कहा और फ़ोन डिस्कनेक्ट कर दिया. दोनों बच्चों को कलेजे से सटाते हुए उसे आज बेहद राहत का एहसास हो रहा था.

👉 एक बात मेरी समझ में कभी नहीं आई

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