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गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020

👉 एक हृदयस्पर्शी घटना

सुबह सूर्योदय हुआ ही था कि एक वयोवृद्ध सज्जन डॉक्टर के दरवाजे पर आकर घंटी बजाने लगा।सुबह-सुबह कौन आ गया? कहते हुए डॉक्टर की पत्नी ने दरवाजा खोला। वृद्ध को देखते ही डॉक्टर की पत्नी ने कहा, दादा आज इतनी सुबह? क्या परेशानी हो गयी आपको?

    वयोवृद्ध ने कहा अपने अंगूठे के टांके कटवाने आया हूं, डॉक्टर साहब के पास। मुझे 9 बजे दूसरी जगह पहुंचना होता है, इसलिए जल्दी आया। सॉरी डॉक्टर साहब।

    कोई बात नहीं दादा, बैठो। दिखाओ अपना अंगूठा। डॉक्टर ने पूरे ध्यान से अंगूठे के टांके खोले और कहा कि दादा बहुत बढ़िया है। आपका घाव भर गया है।फिर भी मैं पट्टी लगा देता हूं कि कहीं,चोंट न पहुंचे। डाक्टर तो बहुत होते हैं परंतु यह डॉक्टर बहुत हमदर्दी रखने वाले और दयालु प्रवर्ति के थे।

    डॉक्टर ने पट्टी बांधने के बाद पूछा – दादा आपको 9 बजे कहां पहुंचना पड़ता है। आपको देर हो गई हो तो मैं चलकर आपको छोड़ आता हूं ।

    वृद्ध ने कहा नहीं नहीं ,डॉक्टर साहब, अभी तो मैं घर जाऊंगा, नाश्ता तैयार करूंगा, फिर निकलूंगा और करीब 9 बजे पहुंच जाऊंगा। उन्होंने डॉक्टर का आभार माना और जाने के लिए खड़े हुए । पैसे लेकर के उपचार करने वाले तो बहुत डॉक्टर होते हैं परंतु दिल से उपचार करने वाले कम ही होते हैं।

    दादा खड़े हुए तभी डॉक्टर की पत्नी ने आकर कहा कि दादा नाश्ता यहीं कर लो। वृद्ध ने कहा, ना बहन। मैं तो यहां नाश्ता कर लेता परंतु उसको नाश्ता कौन कराएगा? डॉक्टर ने पूछा किस को नाश्ता कराना है?

    वृद्ध ने कहा कि मेरी पत्नी को । वह कहां रहती है और 9 बजे आपको उसके यहां कहां पहुंचना है? वृद्ध ने कहा, डॉक्टर साहब वह तो मेरे बिना रहती ही नहीं थी, परंतु अब वो अस्वस्थ है तो नर्सिंग होम में एडमिट है। डॉक्टर ने पूछा, उनको क्या तकलीफ है?

    वृद्ध व्यक्ति ने कहा, मेरी पत्नी को अल्जाइमर हो गया है, उसकी याददाश्त चली गई है। पिछले 5 साल से वह मेरे को पहचानती नहीं है। मैं नर्सिंग होम में जाता हूं, उसको नाश्ता खिलाता हूं तो वह फटी फ़टी आंख से शून्य नेत्रों से मुझे देखती है। मैं उसके लिए अनजाना हो गया हूं। ऐसा कहते कहते वृद्ध की आंखों में आंसू आ गए।

    डॉक्टर और उसकी पत्नी की आंखें भी नम हो गई। याद रखें प्रेम निस्वार्थ होता है। प्रेम सब के दिल मे होता है परंतु “एक पक्षिय प्रेम” यह दुर्लभ है, पर होता है। कबीर ने लिखा है, “प्रेम ना बाड़ी उपजे प्रेम न हाट बिकाय।

    डॉक्टर और उसकी पत्नी ने कहा, दादा 5 साल से आप रोज नर्सिंग होम में उनको नाश्ता कराने जाते हो? इतने वृद्ध हो आप,थकते नहीं हो, ऊबते नहीं हो?

    उन्होंने कहा कि मैं तीन बार जाता हूं। डॉक्टर साहब, उसने जिंदगी में मेरी बहुत सेवा की और आज मैं उसके सहारे जिंदगी जी रहा हूं। उसको देखता हूं तो मेरा मन भर आता है। मैं उसके पास बैठता हूं तो मुझ में शक्ति आ जाती है। अगर वह न होती तो अभी तक मैं भी बिस्तर पकड़ लेता लेकिन उसको ठीक करना है , उसकी संभालना है, इसलिए मुझ में रोज ताकत आ जाती है। उसके कारण ही मुझ में इतनी फुर्ती है। सुबह उठता हूं तो तैयार होकर के काम में लग जाता हूं। ये भाव रहता है कि उससे मिलने जाना है, उसके साथ नाश्ता करना है, उसको नाश्ता कराना है। उसके साथ नाश्ता करने का आनंद ही अलग है। मैं अपने हाथ से उसको नाश्ता खिलाता हूं।

    डॉक्टर ने कहा, दादा एक बात पूछूं? ‘पूछो ना’ डॉक्टर साहब। डॉक्टर ने कहा, दादा वह तो आपको पहचानती तक नहीं। न आपसे बोलती भी है, न हंसती है तब भी तुम मिलने जाते हो।

    तब उस समय वृद्ध ने जो शब्द कहे वो शब्द दुनिया में सबसे अधिक हृदयस्पर्शी और मार्मिक हैं। वृद्ध बोले,

डॉक्टर साहब वह नहीं जानती कि मैं कौन हूं, पर मैं तो जानता हूं ना कि वह कौन है। इतना कहते कहते हैं वृद्ध की आंखों से पानी की धारा बहने लगी।

    डॉक्टर और उनकी पत्नी की भी आंखें भी भर आई और सोचा कि पारिवारिक जीवन में ‘स्वार्थ’ अभिशाप है और ‘प्रेम’ आशीर्वाद।

प्रेम कम होता है तभी परिवार टूटता है।

रविवार, 29 मार्च 2020

"शर्त "

👉 महान लेखक टालस्टाय की एक कहानी है- "शर्त "

इस कहानी में दो मित्रो में आपस मे शर्त लगती है कि, यदि उसने 1 माह एकांत में बिना किसी से मिले,बातचीत किये एक कमरे में बिता देता है, तो उसे 10 लाख नकद वो देगा। इस बीच, यदि वो शर्त पूरी नहीं करता, तो वो हार जाएगा। पहला मित्र ये शर्त स्वीकार कर लेता है। उसे दूर एक खाली मकान में बंद करके रख दिया जाता है। बस दो जून का भोजन और कुछ किताबें उसे दी गई।

उसने जब वहां अकेले रहना शुरू किया तो 1 दिन 2 दिन किताबो से मन बहल गया फिर वो खीझने लगा। उसे बताया गया था कि थोड़ा भी बर्दाश्त से बाहर हो तो वो घण्टी बजा के संकेत दे सकता है और उसे वहां से निकाल लिया जाएगा।

जैसे जैसे दिन बीतने लगे उसे एक एक घण्टे युगों से लगने लगे। वो चीखता, चिल्लाता लेकिन शर्त का खयाल कर बाहर किसी को नही बुलाता। वो अपने बाल नोचता, रोता, गालियां देता तड़फ जाता, मतलब अकेलेपन की पीड़ा उसे भयानक लगने लगी पर वो शर्त की याद कर अपने को रोक लेता।

कुछ दिन और बीते तो धीरे धीरे उसके भीतर एक अजीब शांति घटित होने लगी। अब उसे किसी की आवश्यकता का अनुभव नही होने लगा। वो बस मौन बैठा रहता। एकदम शांत उसका चीखना चिल्लाना बंद हो गया। 

इधर, उसके दोस्त को चिंता होने लगी कि एक माह के दिन पर दिन बीत रहे हैं पर उसका दोस्त है कि बाहर ही नही आ रहा है। माह के अब अंतिम 2 दिन शेष थे, इधर उस दोस्त का व्यापार चौपट हो गया वो दिवालिया हो गया। उसे अब चिंता होने लगी कि यदि उसके मित्र ने शर्त जीत ली तो इतने पैसे वो उसे कहाँ से देगा।

वो उसे गोली मारने की योजना बनाता है और उसे मारने के लिये जाता है। जब वो वहां पहुँचता है तो उसके आश्चर्य का ठिकाना नही रहता। वो दोस्त शर्त के एक माह के ठीक एक दिन पहले वहां से चला जाता है और एक खत अपने दोस्त के नाम छोड़ जाता है।

खत में लिखा होता है-
प्यारे दोस्त इन एक महीनों में मैंने वो चीज पा ली है जिसका कोई मोल नही चुका सकता। मैंने अकेले मे रहकर असीम शांति का सुख पा लिया है और मैं ये भी जान चुका हूं कि जितनी जरूरतें हमारी कम होती जाती हैं उतना हमें असीम आनंद और शांति मिलती है मैंने इन दिनों परमात्मा के असीम प्यार को जान लिया है। इसीलिए मैं अपनी ओर से यह शर्त तोड़ रहा हूँ अब मुझे तुम्हारे शर्त के पैसे की कोई जरूरत नही।

इस उद्धरण से समझें कि लॉकडाउन के इस परीक्षा की घड़ी में खुद को झुंझलाहट, चिंता और भय में न डालें, उस परमात्मा की निकटता को महसूस करें और जीवन को नए दृष्टिकोण से देखने का प्रयत्न कीजिये, इसमे भी कोई अच्छाई होगी यह मानकर सब कुछ भगवान को समर्पण कर दें।

विश्वास मानिए अच्छा ही होगा।
लॉक डाउन का पालन करे। स्वयं सुरक्षित रहें, परिवार, समाज और राष्ट्र को सुरक्षित रखें।

लॉक डाउन के बाद जी तोड़ मेहनत करना है, स्वयं, परिवार और राष्ट्र के लिए... देश की गिरती अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए👍🏻👍🏻👍🏻

सभी को प्रणाम🙏🏻🙏🏻🙏🏻

शनिवार, 28 मार्च 2020

👉 एक सूफी कहानी 🔥

एक फकीर जो एक वृक्ष के नीचे ध्यान कर रहा था,  रोज एक लकड़हारे को लकड़ी काटते ले जाते देखता था। एक दिन उससे कहा कि सुन भाई, दिन— भर लकड़ी काटता है, दो जून रोटी भी नहीं जुट पाती। तू जरा आगे क्यों नहीं जाता। वहां आगे चंदन का जंगल है। एक दिन काट लेगा, सात दिन के खाने के लिए काफी हो जाएगा।

गरीब लकड़हारे को भरोसा तो नहीं आया, क्योंकि वह तो सोचता था कि जंगल को जितना वह जानता है और कौन जानता है! जंगल में ही तो जिंदगी बीती। लकड़ियां काटते ही तो जिंदगी बीती। यह फकीर यहां बैठा रहता है वृक्ष के नीचे, इसको क्या खाक पता होगा? मानने का मन तो न हुआ, लेकिन फिर सोचा कि हर्ज क्या है, कौन जाने ठीक ही कहता हो! फिर झूठ कहेगा भी क्यों? शांत आदमी मालूम पड़ता है, मस्त आदमी मालूम पड़ता है। कभी बोला भी नहीं इसके पहले। एक बार प्रयोग करके देख लेना जरूरी है।

तो गया। लौटा फकीर के चरणों में सिर रखा और कहा कि मुझे क्षमा करना, मेरे मन में बड़ा संदेह आया था, क्योंकि मैं तो सोचता था कि मुझसे ज्यादा लकड़ियां कौन जानता है। मगर मुझे चंदन की पहचान ही न थी। मेरा बाप भी लकड़हारा था, उसका बाप भी लकड़हारा था। हम यही काटने की, जलाऊ—लकड़ियां काटते—काटते जिंदगी बिताते रहे, हमें चंदन का पता भी क्या, चंदन की पहचान क्या! हमें तो चंदन मिल भी जाता तो भी हम काटकर बेच आते उसे बाजार में ऐसे ही। तुमने पहचान बताई, तुमने गंध जतलाई, तुमने परख दी। जरूर जंगल है। मैं भी कैसा अभागा! काश, पहले पता चल जाता! फकीर ने कहा कोई फिक्र न करो, जब पता चला तभी जल्दी है। जब घर आ गए तभी सबेरा है। दिन बड़े मजे में कटने लगे। एक दिन काट लेता, सात— आठ दिन, दस दिन जंगल आने की जरूरत ही न रहती। 

एक दिन फकीर ने कहा; मेरे भाई, मैं सोचता था कि तुम्हें कुछ अक्ल आएगी। जिंदगी— भर तुम लकड़ियां काटते रहे, आगे न गए; तुम्हें कभी यह सवाल नहीं उठा कि इस चंदन के आगे भी कुछ हो सकता है? उसने कहा; यह तो मुझे सवाल ही न आया। क्या चंदन के आगे भी कुछ है? उस फकीर ने कहा : चंदन के जरा आगे जाओ तो वहां चांदी की खदान है। लकडिया—वकडिया काटना छोड़ो। एक दिन ले आओगे, दो—चार छ: महीने के लिए हो गया।

अब तो भरोसा आया था। भागा। संदेह भी न उठाया। चांदी पर हाथ लग गए, तो कहना ही क्या! चांदी ही चांदी थी! चार—छ: महीने नदारद हो जाता। एक दिन आ जाता, फिर नदारद हो जाता। लेकिन आदमी का मन ऐसा मूढ़ है कि फिर भी उसे खयाल न आया कि और आगे कुछ हो सकता है। फकीर ने एक दिन कहा कि तुम कभी जागोगे कि नहीं, कि मुझी को तुम्हें जगाना पड़ेगा। आगे सोने की खदान है मूर्ख! तुझे खुद अपनी तरफ से सवाल, जिज्ञासा, मुमुक्षा कुछ नहीं उठती कि जरा और आगे देख लूं? अब छह महीने मस्त पड़ा रहता है, घर में कुछ काम भी नहीं है, फुरसत है। जरा जंगल में आगे देखकर देखूं यह खयाल में नहीं आता?

उसने कहा कि मैं भी मंदभागी, मुझे यह खयाल ही न आया, मैं तो समझा चांदी, बस आखिरी बात हो गई, अब और क्या होगा? गरीब ने सोना तो कभी देखा न था, सुना था। फकीर ने कहा : थोड़ा और आगे सोने की खदान है। और ऐसे कहानी चलती है। फिर और आगे हीरों की खदान है। और ऐसे कहानी चलती है। और एक दिन फकीर ने कहा कि नासमझ, अब तू हीरों पर ही रुक गया? अब तो उस लकड़हारे को भी बडी अकड़ आ गई, बड़ा धनी भी हो गया था, महल खड़े कर लिए थे। उसने कहा अब छोड़ो, अब तुम मुझे परेशांन न करो। अब हीरों के आगे क्या हो सकता है?

उस फकीर ने कहा. हीरों के आगे मैं हूं। तुझे यह कभी खयाल नहीं आया कि यह आदमी मस्त यहां बैठा है, जिसे पता है हीरों की खदान का, वह हीरे नहीं भर रहा है, इसको जरूर कुछ और आगे मिल गया होगा! हीरों से भी आगे इसके पास कुछ होगा, तुझे कभी यह सवाल नहीं उठा?

रोने लगा वह आदमी। सिर पटक दिया चरणों पर। कहा कि मैं कैसा मूढ़ हूं मुझे यह सवाल ही नहीं आता। तुम जब बताते हो, तब मुझे याद आता है। यह तो मेरे जन्मों—जन्मों में नहीं आ सकता था खयाल कि तुम्हारे पास हीरों से भी बड़ा कोई धन है। 

फकीर ने कहा : उसी धन का नाम ध्यान है। 

अब खूब तेरे पास धन है, अब धन की कोई जरूरत नहीं। अब जरा अपने भीतर की खदान खोद, जो सबसे कीमती है।

बुधवार, 19 जून 2019

👉 "नियम का महत्व"

एक संत थे। एक दिन वे एक किसान के घर गए। किसान ने उनकी बड़ी सेवा की। सन्त ने उसे कहा कि रोजाना नाम -जप करने का कुछ नियम ले लो। किसान ने कहा बाबा, हमारे को वक्त नहीं मिलता। सन्त ने कहा कि अच्छा, रोजाना ठाकुर जी की मूर्ति के दर्शन कर आया करो। किसान ने कहा मैं तो खेत में रहता हूँ और ठाकुर जी की मूर्ति गाँव के मंदिर में है, कैसे करूँ ? 

संत ने उसे कई साधन बताये, कि वह कुछ-न-कुछ नियम ले लें। पर वह यही कहता रहा कि मेरे से यह बनेगा नहीं, मैं खेत में काम करूँ या माला लेकर जप करूँ। इतना समय मेरे पास कहाँ है ? बाल-बच्चों का पालन पोषण करना है। आपके जैसे बाबा जी थोड़े ही हूँ। कि बैठकर भजन करूँ। संत ने कहा कि अच्छा तू क्या कर सकता है ? किसान बोला कि पड़ोस में एक कुम्हार रहता है। उसके साथ मेरी मित्रता है। उसके और मेरे खेत भी पास-पास हैं, और घर भी पास-पास है। रोजाना एक बार उसको देख लिया करूँगा। सन्त ने कहा कि ठीक है, उसको देखे बिना भोजन मत करना। किसान ने स्वीकार कर लिया। जब उसकी पत्नी कहती कि भोजन कर लो। तो वह चट बाड़ पर चढ़कर कुम्हार को देख लेता। और भोजन कर लेता। इस नियम में वह पक्का रहा। 
  
एक दिन किसान को खेत में जल्दी जाना था। इसलिए भोजन जल्दी तैयार कर लिया। उसने बाड़ पर चढ़कर देखा तो कुम्हार दीखा नहीं। पूछने पर पता लगा कि वह तो मिट्टी खोदने बाहर गया है। किसान बोला कि कहाँ मर गया, कम से कम देख तो लेता। अब किसान उसको देखने के लिए तेजी से भागा। उधर कुम्हार को मिट्टी खोदते-खोदते एक हाँडी मिल गई। जिसमें तरह-तरह के रत्न, अशर्फियाँ भरी हुई थीं। उसके मन में आया कि कोई देख लेगा तो मुश्किल हो जायेगी। अतः वह देखने के लिए ऊपर चढा तो सामने वह किसान आ गया।

कुम्हार को देखते ही किसान वापस भागा। तो कुम्हार ने समझा कि उसने वह हाँडी देख ली। और अब वह आफत पैदा करेगा। कुम्हार ने उसे रूकने के लिए आवाज लगाई। किसान बोला कि बस देख लिया, देख लिया। कुम्हार बोला कि अच्छा, देख लिया तो आधा तेरा आधा मेरा, पर किसी से कहना मत। 

किसान वापस आया तो उसको धन मिल गया। उसके मन में विचार आया कि संत से अपना मनचाहा नियम लेने में इतनी बात है। अगर सदा उनकी आज्ञा का पालन करूँ तो कितना लाभ है। ऐसा विचार करके वह किसान और उसका मित्र कुम्हार दोनों ही भगवान् के भक्त बन गए।

तात्पर्य यह है कि हम दृढता से अपना एक उद्देश्य बना ले, नियम ले लें तो वह भी हमारी डुबती किश्ती पार लगा सकता है। 

मंगलवार, 18 जून 2019

👉 कर्म का सिद्धान्त

आंख ने पेड़ पर फल देखा .. लालसा जगी.. 
आंख तो फल तोड़ नही सकती इसलिए पैर गए पेड़ के पास फल तोड़ने..
पैर तो फल तोड़ नही सकते इसलिए हाथों ने फल तोड़े और मुंह ने फल खाएं और वो फल पेट में गए.
अब देखिए जिसने देखा वो गया नही, जो गया उसने तोड़ा नही, जिसने तोड़ा उसने खाया नही, जिसने खाया उसने रक्खा नहीं क्योंकि वो पेट में गया
अब जब माली ने देखा तो डंडे पड़े पीठ पर जिसकी कोई गलती नहीं थी ।
लेकिन जब डंडे पड़े पीठ पर तो आंसू आये आंख में क्योंकि सबसे पहले फल देखा था आंख ने।

शनिवार, 15 जून 2019

👉 दुष्ट अपने कर्मों का फल अवश्य पाता है

एक बार एक चक्रवर्ती सम्राट आखेट हेतु वन गमन पर थे। दैववश वे अपने सहायको से अलग हो गए। विशाल वन के किसी अनजान छोर पर उन्हें मार्ग पर एक सांप दिखा जो "उल्टा "चल रहा था मतलब सर से पुंछ की तरफ। राजा को देख वह अत्यंत ही दारुन्य अवस्था में राजा से बोला "राजन मै एक दुर्धुष रोग से अत्यंत ही पीड़ित हूँ। मेरी सहायता करे। मै आपका शरणागत हूँ। 

राजा द्रवित हो गए जैसा की हिन्दू राजाओ के डीएनए में है। पूछा क्या उपचार है इसका। 
सर्प बोला, " राजन किसी स्वस्थ व्यक्ति के उदर मे यदि मुझे 4 महीने शरण मिले तो मै स्वस्थ हो सकता हु अन्यथा कोई और उपाय नहीं है जीवन का। 
राजा ने परोपकार के महत्व का स्मरण कर सर्प को अपने उदर में शरण दे दी। 

वन से निकलते ही राजा एक अनजान राज्य के अनजान नगर में आ पहुंचे। उदरस्थ सर्प के प्रभाव से राजा रुग्ण हो गए और शक्तिहीन होकर एक चोराहे पर गिर पड़े। 
दैवयोग से तभी एक दण्डित युवती को उसके पिता द्वारा उसी चोराहे पर लाया गया और सजा के रूप में उस रुग्ण भिखारी से दिख रहे राजा से उसका विवाह करवा दिया गया। 
युवती अपने पति राजा को लेकर एक खंडहर में रुकी और अपने पति को शारीरिक रूप से पुष्ट करने का प्रयास करने लगी। कुछ पारिश्रमिक भी वह लाती और खंडहर में छुपा देती। 

कई दिन हो गए युवती के प्रयास को लेकिन राजा की तबियत और बिगड़ती चली गई साथ ही रोज ही छुपाया हुआ परिश्रमिक भी चोरी हो जाता। युवती परेशां हो गई। 
रोज मंदिर जाने लगी।  एक दिन थोडा जल्दी ही अचानक अपने खंडहर आ गई।  दो लोगो की आवाज आती देख वह ओट से छुप कर देखने लगी की एक बिल से एक विशाल काला सर्प राजा के पास आकर एक सांप को बुरा भला कह रहा था। 

"अरे दुष्ट वाम मार्गी सर्प बाहर निकल क्यों इस तरुण सुदर्शन व्यक्ति का शरीर नष्ट कर रहा है इसके उदर में स्थित होकर। इसने तुझे आश्रय दिया और तू उसे ही निगल रहा है दुष्ट। "

ये सब सुनकर अचानक राजा के मुह से एक विशाल हरा सर्प बाहर आया पहले पूछ फिर सिर। बाहर आकर उल्टा चलता हुआ उस काले नाग पर प्रतिप्रहार करने लगा। 
'सरे महाधूर्त काले नाग तू तो और भी निकृष्ट है जो अथाह धन पर बैठ कर रोज इस पुरुष की स्त्री द्वारा अर्जित किये हुए धन को निगल जाता है। स्त्री का कमाया धन चुराता है पापी। 

दोनों एक दूसरे पर लगातार आरोप लगा रहे थे की अचानक कालनाग बोला, " क्या कोई नहीं जानता की छाछ को गर्म करके उसमे कटु निम्ब के नरम पत्ते डाल कर इस व्यक्ति को पिलाया जाए तो तू इसके शरीर से बाहर आकर मृत्यु को प्राप्त हो जाए। 

यह सुनकर वामी सर्प बोला की यह भी सभी जानते है सरसो के तेल को गर्म करके उसमे कर्पूर डाल कर तेरे बिल में डाल दिया जाए तो तू भी तत्काल अपने गिरोह के साथ मारा जायेगा और सारा धन उस व्यक्ति को सिद्ध हो जायेगा। 

युवती ने दोनों की बात सुन ली। वह अत्यंत हर्षित हुई। फटाफट बाजार से सभी सामान लाकर उसने राजा को छाछ पिला दी कुछ ही देर मे राजा को वमन के साथ वह वाम हरित सर्प बाहर आ गया और तड़पता हुआ मर गया। फिर युवती ने बिल में तेल डाल दिया वहा भी वह काल सर्प मारा गया और खजाना युवती ने प्राप्त कर लिया। 

कुछ ही दिनों में राजा स्वस्थ हो गए। स्त्री से पूछा। स्त्री ने सब कह सुनाया। राजा ने परिचय दिया की वे एक चक्रवर्ती सम्राट है। 

👉 एक बात मेरी समझ में कभी नहीं आई

🏳️ध्यान से पढ़ियेगा👇      〰️〰️〰️〰️〰️ एक बात मेरी समझ में कभी नहीं आई कि  ये फिल्म अभिनेता (या अभिनेत्री) ऐसा क्या करते हैं कि इनको एक फिल्म...