गुरुवार, 28 सितंबर 2017

हम मुसलमान नही हिन्दू हैं

हम मुसलमान नही हिन्दू हैं हमने विदेशी आक्रमणकारियों की वजह से मजहब बदला है – पाकिस्तानी एक्टिविस्ट

पाकिस्तान की ह्यूमन राईट एक्टिविस्ट फौजिया सईद खुलेआम कहती हैं कि हम पहले हिन्दू थे और हमने विदेशी आक्रमणकारियों की वजह से अपना मजहब बदल लिया है । परन्तु भारत में जब आरएसएस के प्रमुख मोहन  भागवत जब ये कहते हैं कि “भारत में रहने वाले सभी हिन्दू हैं चाहे वो किसी भी पूजा पद्धति को मानते हो “ तो हमारे देश में ही लोगों को एतराज़ हो जाता है । वोट बैंक की राजनीती के लिए इस देश और भू खंड की संस्कृति को भूलकर मुल्लों के तलवे चाटने वाली पार्टियों को फौजिया सईद जी का ये विडियो जरुर देखना चाहिए ।

बता दें कि फौजिया सईद का जन्म लाहौर में 3 जून 1951 को हुआ था – उन्होंने बहुत सारी किताबें भी लिखी हैं – वे पाकिस्तान हेरिटेज संस्था लोकविर्सा की डायरेक्टर भी हैं  , उनको पाकिस्तान में खुली मानसिकता और सच का साथ देने वाली महिला के तौर पर जाना जाता है , फ़ौज़िया को लगता है अगर पाकिस्तान कश्मीर का राग अलापना छोड़ दे तो भारत की मदद से वो एक समृद्ध देश बन सकता है लेकिन पाकिस्तान चीन के हाथों में खेल रहा है और मजहबी कट्टरपंथी मानसिकता से ग्रस्त है ।

देखें ये विडियो और जाने पाकिस्तान की इस स्कॉलर का सच का क़बूलनामा, जिसको देखकर बड़े बड़े कट्टरपंथियों की बोलती हो जाएगी बंद।




शनिवार, 23 सितंबर 2017

👉 धर्म के लिए मरना बेहतर समझा

🌹 अगर गुरु तेगबहादुर जी नहीं होते तो शायद इस देश में अभी हिन्दू नाम मात्र के लिए भी नहीं बचते थे और हम सभी भी यही कोशिश कर रहे होते कि पुरे संसार का इस्लामीकरण केसे किया जाए?
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🔴 औरंगजेब के शासन काल की बात है. औरंगजेब के दरबार में एक विद्वान पंडित आकर रोज़ गीता के श्लोक पढ़ता और उसका अर्थ सुनाता था, पर वह पंडित गीता में से कुछ श्लोक छोड़ दिया करता था.

🔵 एक दिन पंडित बीमार हो गया और औरंगजेब को गीता सुनाने के लिए उसने अपने बेटे को भेज दिया परन्तु उसे बताना भूल गया कि उसे किन-किन श्लोकों का अर्थ राजा को नहीं बताना. पंडित के बेटे ने जाकर औरंगजेब को पूरी गीता का अर्थ सुना दिया. गीता का पूरा अर्थ सुनकर औरंगजेब को यह ज्ञान हो गया कि प्रत्येक धर्म अपने आपमें महान है किन्तु औरंगजेब की हठधर्मिता थी कि उसे अपने धर्म के धर्म के अतिरिक्त किसी दूसरे धर्म की प्रशंसा सहन नहीं थी.

🔴 औरंगजेब ने सबको इस्लाम धर्म अपनाने का आदेश दे दिया और संबंधित अधिकारी को यह कार्य सौंप दिया. औरंगजेब ने कहा, “‘सबसे कह दो या तो इस्लाम धर्म कबूल करें या मौत को गले लगा लें.” इस प्रकार की ज़बरदस्ती शुरू हो जाने से अन्य धर्म के लोगों का जीवन कठिन हो गया.

🔵 जुल्म से ग्रस्त कश्मीर के पंडित गुरु तेगबहादुर के पास आए और उन्हें बताया कि किस प्रकार ‍इस्लाम को स्वीकार करने के लिए अत्याचार किया जा रहा है, यातनाएं दी जा रही हैं. और उनसे अपने धर्म को बचाने की गुहार लगाई.

🔴 तत्पश्चात गुरु तेगबहादुर जी ने पंडितों से कहा कि आप जाकर औरंगजेब से कह ‍दें कि यदि गुरु तेगबहादुर ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया तो उनके बाद हम भी इस्लाम धर्म ग्रहण कर लेंगे और यदि आप गुरु तेगबहादुर जी से इस्लाम धारण नहीं करवा पाए तो हम भी इस्लाम धर्म धारण नहीं करेंगे’. औरंगजेब ने यह स्वीकार कर लिया.

🔵 गुरु तेगबहादुर दिल्ली में औरंगजेब के दरबार में स्वयं गए. औरंगजेब ने उन्हें बहुत से लालच दिए, पर गुरु तेगबहादुर जी नहीं माने तो उन पर ज़ुल्म किए गये, उन्हें कैद कर लिया गया, दो शिष्यों को मारकर गुरु तेगबहादुर जी को ड़राने की कोशिश की गयी, पर वे नहीं माने. उन्होंने औरंगजेब से कहा- ‘यदि तुम ज़बरदस्ती लोगों से इस्लाम धर्म ग्रहण करवाओगे तो तुम सच्चे मुसलमान नहीं हो क्योंकि इस्लाम धर्म यह शिक्षा नहीं देता कि किसी पर जुल्म करके मुस्लिम बनाया जाए.’

🌹 गुरुद्वारा शीश गंज साहिब

🔴 औरंगजेब यह सुनकर आगबबूला हो गया. उसने दिल्ली के चांदनी चौक पर गुरु तेगबहादुर जी का शीश काटने का हुक्म ज़ारी कर दिया और गुरुतेग बहादुर जी ने हंसते-हंसते बलिदान दे दिया. गुरुतेग बहादुर जी की याद में उनके ‘शहीदी स्थल’ पर गुरुद्वारा बना है, जिसका नाम गुरुद्वारा ‘शीश गंज साहिब’ है.

🔵 शर्म कि बात तो ये हे कि आज ओरंगजेब के नाम से अनेको सड़के हे और आज भी चल रही हे

शनिवार, 18 मार्च 2017

तरबूज की कहानी

मनोहर पार्रिकर द्वारा तरबूज की सच्ची कहानी

"मैं गोवा के पारा गाँव से हूँ इसलिए हमें पार्रिकर कहा जाता है।हमारा गाँव अपने तरबूजों के लिए प्रसिद्ध है। जब मैं छोटा था मेरे गाँव के किसान फसल के अंत में मई महीने में तरबूज खाने की प्रतियोगिता आयोजित करते थे।

गाँव और आस पास के सभी बच्चे तरबूज खाने के लिए बुलाए जाते थे और उन्हें अधिक से अधिक जितना तरबूज वे खा सकते थे खाना होता था।

वर्षों बाद मैं I.I.T.MUMBAI इंजीनियरिंग पढ़ने आ गया। मैं लगभग 6•5 वर्ष बाद अपने गाँव पहुँचा। मैंने तरबूजों के खेत और बाजार देखे।तरबूजे गायब थे। जो थोड़े बहुत थे वह भी काफी छोटे थे।

मैं उन किसानों को देखने पहुँचा जो तरबूज खाने की प्रतियोगिताएँ आयोजित करते थे। अब यह जिम्मेदारी उनके बेटे देख रहे थे। लेकिन मुझे पहले से कुछ अंतर दिखाई दिया।

पहले बुजुर्ग किसान हमें तरबूज खाने के बाद बीज थूकने के लिए कटोरी देते थे। एक शर्त यह भी होती थी कि तरबूज खाते समय कोई भी बीज कटना नहीं चाहिए।

वह हमें खाने के लिए अपने खेत के अच्छे से अच्छा, बड़े से बड़ा और मीठे से मीठा तरबूज देता थे। इस तरह से वह अपनी अगली फसल के लिए सर्वश्रेष्ठ सर्वोत्तम बीज चुन लेता थे। अगली फसल के तरबूज और भी अच्छे, बड़े और मीठे होते थे। हम वास्तव में बिना वेतन के सर्वश्रेष्ठ बीज चयन करने वाले कुशल बाल श्रमिक होते थे। यह मुझे बाद में पता चला।

उनके बेटों को लगा कि बड़े और मीठे तरबूज बाजार में बेचने पर अधिक धन मिलेगा। इसलिए उन्होंने बड़े, मीठे और अच्छे तरबूज बेचने शुरू कर दिए और प्रतियोगिता में छोटे और कम मीठे तरबूज रखने शुरू कर दिए।

इस प्रकार वर्ष प्रति वर्ष तरबूजे छोटे और छोटे होते गए। तरबूज की उत्पादकता एक वर्ष की होती है। इस प्रकार सात वर्ष में गोवा के पारा गाँव के सर्वश्रेष्ठ तरबूज विलुप्त हो गए।"

"मनुष्य में औसत उत्पादकता 25 वर्ष है। नस्ल परिवर्तन में लगभग 200 वर्ष लग जाते हैं। हम अपनी पीढ़ियों को शिक्षित करने में क्या गलती कर रहे हैं इसका असर 200 वर्ष बाद पता चलेगा। और निश्चित रूप से उसको सुधारने में भी ।"

"जब तक हम अपनी शिक्षा व्यवस्था में सर्वश्रेष्ठ प्रशिक्षित एवं सुयोग्य अध्यापकों को स्थान नहीं देंगे हम विश्व में सर्वश्रेष्ठ नहीं हो सकते। हमें शिक्षा व्यवस्था में सर्वश्रेष्ठ लोगों को बिना भेदभाव के स्थान देना चाहिए।"

अगली पीढ़ी तक अपनी संस्कृति एवं सभ्यता एवं ज्ञान की विविधता को पहुँचाने की जिम्मेदारी सबकी है भारत के प्रत्येक नागरिक की है।और सभी को यह जिम्मेदारी पूरी लगन और ईमानदारी से निभाना चाहिए।


गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

16 साल से जिस घोटले पर थी कांग्रेस सरकार चुप

आपको ये जानकार हैरानी होगी कि भारतीय सेना द्वारा गुलाम कश्मीर की जमीन का किराया दिया जाता रहा है. लेकिन ये बात पूरी तरह से सही है. सीबीआई के अनुसार भारतीय सेना पिछले 16 सालों से गुलाम कश्मीर स्तिथ चार प्लाटों का किराया दे रही थी. सीबीआई ने अब इसकी जांच शुरू कर दी है.

सीबीआइ ने अब इस मामले की जांच पड़ताल शुरू कर दी है. सीबीआई की एफआइआर के अनुसार खसरा नंबर- 3,000, 3,035, 3,041, 3,045 की 122 कनाल और 18 मारला जमीन का इस्तेमाल भारतीय सेना कर रही है. और सच्चाई यह है कि इस खसरा नंबर की जमीन गुलाम कश्मीर में चली गई है. लेकिन पिछले 16 वर्षों से इस जमीन के किराये की रकम सरकारी खजाने से निकाली जा रही थी.

ये बात सामने आयी है कि डिफेंस एस्टेट विभाग के कुछ अधिकारियों ने आपराधिक साजिश के तहत इस जमीन को भारत में दिखाकर उसे सेना के उपयोग में दिखा दिया और इसके लिए किराया भी दिया जाने लगा. अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि किराया किसी एक व्यक्ति को दिया जाता था या कई लोगों में बांटा जाता था. सीबीआइ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि हो सकता है कि इस घोटाले में सेना के कुछ वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हों.

सीबीआइ की एफआइआर से यह पता लगा है कि तत्कालीन सब डिविजनल डिफेंस एस्टेट अधिकारी आरएएस चंद्रवंशी, नौशेरा के पटवारी दर्शन कुमार ने राजेश कुमार और अन्य व्यक्तियों के साथ मिलकर यह काम किया था. इन लोगों ने जमीन के फर्जी दस्तावेज जमा किए थे. सेना अधिकारी, एस्टेट अधिकारी और अन्य अधिकारियों वाले बोर्ड ने जमीन के लिए 4.99 लाख रुपये जारी किए. इस मामले में सरकारी खजाने को छह लाख रुपये का नुकसान पहुंचा. एफआइआर में यह भी कहा गया है कि सेना ने नागरिकों से यह जमीन अधिग्रहीत की थी. बोर्ड ने जमीन की जांच करने के बाद किराए के लिए मंजूरी प्रदान की थी. लेकिन अधिकारियों के बोर्ड ने एक दूसरे के साठगांठ कर जांच में गलत जानकारी दी थी. सीबीआइ ने बताया कि बोर्ड की बैठक वर्ष 2000 में बुलाई गई जिसमें चंद्रवंशी और दर्शन कुमार को रक्षा बलों में कार्यरत बताया गया और राजेश कुमार को 4.99 लाख रुपये किराए के जारी किए गए.

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

एक ईमानदार को मिटाने

जो लड़ते थे कभी कुत्तो की तरह, उनमे अब संधि हो गई !
एक ईमानदार को मिटाने के लिए, सारी सियासत नंगी हो गई!!

तीन लड्डू

एक बुज़ुर्ग दंपत्ति का बेटा जो दिल्ली के एक बड़े विवि में पढता था कुछ दिन की छुट्टियों में गाँव आया, माँ ने लाड़ले के आने की ख़ुशी में प्यार से लड्डू बनाये थे, सो लाकर सामने रख दिये बोली ले बेटा लड्डू खा तेरे लिए बनाये हैं! बेटा प्लेट की ओर देखा तो उसमें 2 लड्डू थे....हर बात में तर्क करने वाला बेटा 'प्रगतिशीलता' दिखाते हुए बोला माँ तीन लड्डू क्यों दे दिए 2 वापस ले जाओ! माँ बोली बेटा 3 कहाँ हैं? 2 ही तो हैं....देख अच्छे से! बेटा बोला कैसे 2 हैं....पूरे तीन लड्डू हैं मैं साबित कर सकता हूँ....बेचारी माँ ठहरी गँवार बोली कैसे? उसनें कुछ यूँ गिनती शुरू की....1 और 2, इन्हें जोड़ कर हुए ना तीन? माँ बोली नहीं बेटा मुझे तो 2 ही दिख रहे हैं.....बेटा तो बेटा अड़ गया बोला 3 ही हैं....बार बार वही तर्क, साबित करने का वही तरीका 1 और 2 इन्हें जोड़ हो गए ना पूरे 3....

माँ बेचारी कहाँ तक बहस करती, चौंका चूल्हा करना था चुपचाप बेटे की हाँ में हाँ मिलाकर चली गई, जाते जाते 'अजी सुनते हो' की टेर लगा गई....सो वहीं पास में ही बाबू जी बैठे थे, कुछ काम कर रहे थे, पर माँ-बेटे की बात भी सुन रहे थे, उन्होंने सब सुना पर एक माँ और बेटे के बीच बोलना ठीक ना समझा....पर अब माँ जा चुकी थी, वे चुपचाप उठकर आये और बोले हाँ बेटा क्या समझा रहे थे अपनी माँ को? ज़रा हम भी तो सुनें....बेटा बोला रहने दीजिए बाबू जी आप नहीं समझेंगे, बाबू जी बोले....बिलकुल समझेंगे बेटा बताओ तो सही....बेटा फिर शुरू, बोला बाबू जी ये कितने लड्डू हैं? 3 ना....बाबू जी, देखे और बोले 2 हैं बेटा....लड़का फिर वही तरीका अपनाया 1 और 2 = 3....बाबू जी JNU में पढ़ने वाले बेटे का क्रांतिकारी स्वभाव तत्काल भाँप गए और बोले.....हाँ बेटा तुम सही कहते हो, तुम्हारी माँ गँवार है ना, कहाँ समझती ये सब, लड्डू 2 नहीं 3 ही हैं, मैं तुमसे सहमत हूँ....बेटा खुश हो गया, उसे लगा उसनें सच्चा क्रांतिकारी बनने की पहली परीक्षा पास कर ली।

तभी उन्होंने क्रांति कुमार की माँ को आवाज़ दी, माँ भागी चली आई....बाबू जी बोले 1 लड्डू उठाओ, खाओ, माँ ने खा लिया, दूसरा खुद बाबू जी खा गए और बेटे से कहा बेटा वो जो तीसरा वाला है ना, तुम खा लेना....बेटा अब बाप का मुँह देखते रह गया, जब उन्होंने धीरे से बताया कि वो बचपन में शाखा जाया करते थे। 

गुंडागर्दी जायज़ नहीं है. लेकिन............

रानी पद्मावती पर फिल्म बना रहे संजय लीला भंसाली के साथ जो हुआ, कितना उचित, कितना अनुचित ।

कहते हैं सिनेमा समाज का आईना होता है, ठीक वैसे ही जैसे साहित्य समाज का आइना होता है. फिर   ये आइना अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने की छूट कैसे दे देता है ? 

"...यहां प्रताप का वतन पला है आज़ादी के नारों पे, 
कूद पड़ी थी यहां हज़ारों पद्मिनियां अंगारों पे.
बोल रही है कण कण से कुर्बानी राजस्थान की..."

फिल्म के लिए रिसर्च करते समय संजय लीला भंसाली ये नहीं पढ़ा या सुना था क्या? भाई पद्मिनी पे पिक्चर बना रहे थे तो मलिक मुहम्मद जायसी का पद्मावत भी पढ़ा ही होगा. 

जब इतिहास के हर दस्तावेज़ में पद्मिनी को जगह ही इस लिए मिली कि वो अलाउद्दीन खिलजी के आने के पहले हज़ारों औरतों के साथ आग में कूद गई, तो कौन से ‘अल्टरनेट व्यू’ से आप खिलजी और पद्मिनी को प्रेम कहानी के खांचे में ढाल रहे हैं? और अगर ‘अल्टरनेट व्यू’ के नाम पे कुछ भी जायज़ है तो फिर विरोध के ‘अल्टरनेट’ तरीके पर इतना हंगामा काहे के लिए है? 

करनी सेना ने संजय लीला भंसाली के साथ सही नहीं किया.

लेकिन करनी सेना जैसे संगठनों को ताकत कहां से आती है? 

उसी बॉलीवुड से आती है, जो संजय लीला भंसाली को थप्पड़ पड़ने पे तो अभिव्यक्ति की आज़ादी चिल्लाने लगता है, लेकिन ए आर रहमान के खिलाफ़ फतवा आने के बाद मुंह ढंक कर सोया रहता है. 

करनी सेना को ताकत उस कोर्ट से आती है जो जल्ली कट्टू को जानवरों पर अत्याचार मान कर बैन कर देता है, लेकिन बकरीद के खिलाफ़ याचिका को सुनने से ही इंकार कर देता है. 

करनी सेना को ताकत उस सिस्टम से मिलती है जो एम एफ़ हुसैन को हिंदू देवी देवताओं की अश्लील तस्वीरें बनाने पर तो सुरक्षा मुहैया कराता है लेकिन चार्ली हेब्दो वाला कार्टून अपने पब्लीकेशन में छापने वाली औरत को दर दर धक्के खाने के लिए मजबूर कर देता है. 

गुंडागर्दी जायज़ नहीं है. लेकिन अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर अपनी ‘इंटेलेक्चुअल गुंडागर्दी’ भी तो बंद कीजिए !

रविवार, 18 दिसंबर 2016

!! माँ कहा करती थी !!


!! सीने से लगा के कहा करती थी माँ मुझ को!! 
!! तू लाल है मेरा ना सता मुझको !!
!! पछताएगा इक दिन जब मैं चली जाऊँगी !!
!! ना चाहते हुए भी अकेला छोड़ जाऊँगी !!
!! ज़माना दिखाएगा गर्मी की शिद्दत तुझको !!
!! याद करके रोएगा तू फिर मुझको !!
!! मुद्दत से मेरी माँ ने सीने से नहीं लगाया !!
!! अब सो गयी ख़ाक में जब कुछ कहने का वक़्त आया !!

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

प्रभु की कृपा

अन्धा आँख प्राप्ति को प्रभु की कृपा समझता है, गरीब धन प्राप्ति को प्रभु की कृपा समझता है, रोगी निरोग होने को प्रभु की कृपा समझता है; किन्तु ये सब धोखा है, ये सब प्रभु की कृपा नहीं है। प्रभु जिस पर कृपा करते हैं, उसे अपनी शरण में ले लेते हैं और उस जीव की सब आसक्तियों को लूट लेते हैं, तब जीव एक मात्र प्रभु का आश्रय लेता है। यही प्रभु की सच्ची कृपा है।

भगवान् की कृपा और माया की कृपा, जीव पर ये दो कृपा होती रहती हैं। इन दोनों कृपाओं में बहुत अंतर है। माया जब खुश होकर कृपा करती है तो धन, दौलत, यश, सम्मान दे देती है। माया की कृपा से मैं और मेरा के भाव जागृत हो जाते हैं।

जब प्रभु कृपा करते हैं तो धन आदि देने से पहले, मैं व मेरा की वृत्ति हटा देते हैं। जैसे प्रभु ने सुदामा जी को धन तो दिया परन्तु देने से पहले उनमें मेरा- तेरा की भावना बिल्कुल खत्म कर दी। भगवान् अपने भक्त का सदा भला चाहते हैं। जैसे - नारद जी ने भगवान् को नारी- विरह का श्राप दिया, परन्तु भगवान् ने नारद जी का कल्याण ही किया, उन पर रुष्ट नहीं हुए।

भगवान् तीन तरह से कृपा करते हैं। एक कृपा साक्षात् दर्शन देकर करते हैं, दूसरी कृपा मन से मंगल चाहकर करते हैं, जैसे कि अनेक निमित्त बना देना, बिना किसी प्रयत्न के कार्य बना देना और तीसरी कृपा संस्पर्श से करते हैं। जैसे मछली अण्डे को दूर से देखती है और उसका पालन करती है। कछुआ दूर से ही अपने अण्डे का चिंतन करता है, इसी से अण्डे का पालन होता है, और वह बढ़ता है।

सूर्य कभी नहीं पूछता कि अन्धकार कितना पुराना है? अन्धकार आज का है या वर्षों पुराना है। सूर्य की किरणें तो अन्धकार के पास पहुँचते ही उसे मिटा देती हैं। ऐसे ही प्रभु की कृपा कभी यह नहीं पूछती कि सामने वाला कितना बड़ा पापी है? प्रभु की कृपा होते ही जीव के समस्त पाप व कष्ट मिट जाते हैं। अगर प्रभु की करुणा पाना चाहते हो तो अपनी अहंता को निकाल दो।

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

अध्यात्म की आधारशिला-मन की स्वच्छता भाग 2

 अध्यात्म की आधारशिला-मन की स्वच्छता भाग 2

मन की मलीनता प्रगति के द्वार बन्द कर देती है। उससे न जम कर श्रम होता है और न पुरूषार्थ, साहस की पूँजी ही उसके पास शेष रहती है। दूषित दृष्टिकोण के कारण भीतर ही भीतर निरन्तर जलता -भुनता रहता है और अशान्ति, उद्विग्रता में घिरा रहता है। झुंझलाहट, अशिष्टता, कटुता ही उसके चेहरे और व्यवहार से टपकती है। दूसरे हर किसी को खराब बताना, सब में दोष ढूँढ़ना और उन्हें अपना शत्रु मानना ऐसा मानसिक दुर्गुण है जिसके कारण अपने भी विराने हो जाते हैं, जो लोग प्यार करते थे और सहयोग देते थे वे भी उदासीन, असन्तुष्ट और प्रतिपक्षी बन जाते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने आपको मरघट के ठूँठ करील की तरह सर्वथा एकाकी और सताया हुआ ही अनुभव करते रहते है। बेचारों की स्थिति दयनीय रहती हैं।

आलसी और अव्यवस्थित, छिन्द्रान्वेषी और उद्विग्र मनुष्य के लिये यह संसार नरक के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। पापी और दुराचारी, चोर और व्यभिचारी की न लोक में प्रतिष्ठा है और न परलोक में स्थान। ऐसे लोग क्षणिक सुख की मृग-तृष्णा में भटकते और ओस चाटते फिरते है, फिर भी उन्हें सन्ताप के अतिरिक्त मिलता कुछ नही। दो घड़ी डरते काँपते कुछ ऐश कर भी लिया तो उसकी प्रति-क्रिया में चिर-अशान्ति उसके पल्ले बँध जाती है । मन की मलीनता से बढ़कर इस संसार में और कोई शत्रु नहीं है। यह पिशाचिनी भीतर ही भीतर कलेजे को चाटती रहती है और जो कुछ मानव जीवन में श्रेष्ठता है उस सबको चुपके-चुपके खा जाती है। बेचारा मनुष्य अपनी बर्बादी की इस तपेदिक को समझ भी नहीं पाता। वह बाहर ही कारणों को ढूँढ़ता रहता है, कभी इस पर कभी उस पर दोष मढ़ता रहता है और भीतर ही भीतर चलने वाली यह सत्यानाशी आरी सब कुछ चीर डालती है। उन्नति, प्रगति, शान्ति, स्नेह, आत्मीयता, प्रसन्नता जैसे लाभ जो उसे मन के स्वच्छ होने पर सहज ही मिल सकते थे, उसके लिए एक असंभव जैसी चीज बने रहते हैं।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य

अध्यात्म की आधारशिला-मन की स्वच्छता भाग 1


अध्यात्म की आधारशिला-मन की स्वच्छता भाग 1

    जिस स्थान पर मनुष्य रहता तथा जिस शरीर से काम लेता है, उसकी नित्य सफाई करनी होती है। आहार-विहार से स्वास्थ्य संवर्धन का लाभ तभी मिल पाता है। गन्दगी बढ़ने से रोगों के कीटाणु उत्पन्न होते तथा अनेकों रोगों को जन्म देते हैं। अतएव स्वच्छता, स्वास्थ्य सन्तुलन के लिए अनिवार्य है। मन की स्वच्छता, पवित्रता शरीर से भी अधिक आवश्यक है। शरीर की भाँति मन पर भी नित्य विकारों की पर्त चढ़ती है। उनका शोधन भी जरूरी है। काम-क्रोध-लोभ-अहंकार जैसे अनेकों विकारों के  कारण ही मन चिन्तित, विक्षुब्ध बना रहता है। 

    स्वच्छ मन में ही श्रेष्ठ विचारों का निवास होता है। वैयक्तिक अथवा सामूहिक उन्नति अथवा अवनति विचारों की उत्कृष्टता पर निर्भर करती है। स्वच्छ मन मानव जीवन की सबसे बड़ी सम्पदा है। ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, स्वार्थ, पाप, व्यभिचार, अपहरण, क्रोध, अहंकार, आदि दुष्प्रवृत्तियाँ मन में बढें़ तो मनुष्य पिशाच बन जाता है। उसकी सारी क्रियाएँ और चेष्टाएँ ऐसी हो जाती हैं जिनसे उसे मनुष्य शरीर में रहते हुए भी प्रत्यक्ष असुर के रूप में देखा जा सकता है। आलस, प्रमाद, निराशा, अनुत्साह, अनियमितता, दीर्घसूत्रता, विलासिता जैसे दुर्गुण मन में जम जायें तो वह एक प्रकार से पशु ही बन जाता है। सींग, पूँछ भले ही उसके न हों पर जीवन के अपव्यय की दृष्टि से वह सब प्रकार पशु से भी अधिक घाटे में रहता है।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
दूसरों के दुर्गुण देखने की बजाय स्वयं का निरिक्षण ही सही है। आत्मिक उन्नति का यही एक उपाय है।
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

आप भला तो जग भला

आप भला तो जग भला
जीवन अनेकों समस्याओं के साथ उलझा हुआ है। उन उलझनों को सुलझाने में, प्रगति पथ पर उपस्थित रोड़ों को हटाने में बहुधा हमारी शक्ति का एक बहुत बड़ा भाग व्यतीत होता है, फिर भी कुछ ही समस्याओं का हल हो पाता है, अधिकांश तो उलझी ही रह जाती हैं। उस अपूर्णता का कारण यह है कि हम हर समस्या का हल अपने से बाहर ढूँढ़ते हैं जब कि वस्तुत: वह हमारे शरीर के अंदर ही छिपा रहता है।

यदि हम कोई आकांक्षाएँ करने से पूर्व अपनी सामर्थ्य और परिस्थितियों का अनुगमन करें तो उनका पूर्ण होना विशेष कठिन नहीं है। एक बार के प्रयत्न में न सही, सोची हुई अवधि में न सही, पूर्ण अंश में न सही, आगे पीछे न्यूनाधिक सफलता इतनी मात्रा में तो मिल ही जाती है कि काम चलाऊ सन्तोष प्राप्त किया जा सके। पर यदि आकांक्षा के साथ- साथ अपनी क्षमता और स्थिति का ठीक अन्दाजा न करके बहुत बढ़ा- चढ़ा लक्ष्य रखा गया है, तो उसकी स्थिति कठिन ही है। ऐसी दशा में असफलता एवं खिन्नता भी स्वाभाविक ही है। पर यदि अपने स्वभाव में आगा पीछा सोचना, परिस्थिति के अनुसार मन चलाने की दूरदर्शिता हो तो उस खिन्नता से बचा जा सकता है और साधारण रीति से जो उपलब्ध हो सकता है उतनी ही आकांक्षा करके शान्तिपूर्वक जीवन यापन किया जा सकता है।

अपने स्वभाव की त्रुटियों का निरीक्षण करके उनमें आवश्यक सुधार करने के लिए यदि हम तैयार हो जाएँ। तो जीवन की तीन चौथाई से अधिक समस्याओं का हल तुरन्त ही हो जाता है। सफलता के बड़े- बड़े स्वप्न देखने की अपेक्षा हम सोच समझ कर कोई सुनिश्चित मार्ग अपनावें और उस पथ पर पूर्ण दृढ़ता एवं मनोयोग के साथ कर्तव्य समझकर चलते रहें तो मस्तिष्क शान्त रहेगा, उसकी पूरी शक्तियाँ लक्ष्य को पूरा करने में लगेंगी और मंजिल तेजी से पास आती चली जायेगी।

समय- समय पर थोड़ी- थोड़ी जो सफलता मिलती चली जायेगी, उसे देखकर हर्ष और सन्तोष भी मिलता जायेगा, इस प्रकार लक्ष्य की ओर अपने कदम एक व्यवस्थित गति के अनुसार बढ़ते चले जायेंगे।

इसके विपरीत यदि हमारा मन बहुत कल्पनाशील है, बड़े- बड़े मंसूबे गाँठता और बड़ी- बड़ी सफलताओं के सुनहरे महल बनाता रहता है, जल्दी से जल्दी बड़ी से बड़ी सफलता के लिए आतुर रहता है तो मंजिल काफी कठिन हो जायेगी। जो मनोयोग कार्य की गतिविधि को सुसंचालित रखने में लगाना चाहिए था वह शेखचिल्ली के सपने देखने में उलझा रहता है। उन सपनों को इतनी जल्दी साकार देखने की उतावली होती है कि जितना श्रम और समय उसके लिए अपेक्षित है वह उसे भार रूप प्रतीत होता है। ज्यों- ज्यों दिन बीतते जाते हैं त्यों- त्यों बैचेनी बढ़ती जाती है और यह स्पष्ट है कि बैचेन आदमी न तो किसी बात को ठीक तरह सोच सकता है और न ठीक तरह कुछ कर ही सकता है। उसकी गतिविधि अधूरी, अस्त- व्यस्त और अव्यवस्थित हो जाती है। ऐसी दशा में सफलता की मंजिल अधिक कठिन एवं अधिक संदिग्ध होती जाती है। उतावला आदमी सफलता के अवसरों को बहुधा हाथ से गँवा ही देता है।

एक संत का कथन है कि ‘मुझे नरक में भेज दो, मैं वहाँ भी अपने लिए स्वर्ग बना लूँगा।’ उनका यह दावा इसी आधार पर था कि अपनी निज की अन्त:भूमि परिष्कृत कर लेने पर व्यक्ति में ऐसी सूझ- बूझ की, गुण- कर्म स्वभाव की उत्पत्ति हो जाती है जिससे बुरे व्यक्तियों को भी अपनी सज्जनता से प्रभावित करने एवं उनकी बुराइयों का अपने ऊपर प्रभाव न पडऩे देने की विशेष क्षमता सिद्ध हो सके। यदि ऐसी विशेषता कोई व्यक्ति अपने में पैदा कर ले, तो यही माना जायेगा कि उसने संसार को सुधार लिया। --

पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार

👉 एक बात मेरी समझ में कभी नहीं आई

🏳️ध्यान से पढ़ियेगा👇      〰️〰️〰️〰️〰️ एक बात मेरी समझ में कभी नहीं आई कि  ये फिल्म अभिनेता (या अभिनेत्री) ऐसा क्या करते हैं कि इनको एक फिल्म...